याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यवहाराध्यायः १७६ ओष्ठौ निर्भुजति वक्रयतीत्यपि कायस्य विकृतिः । एतच्च दोषसंभावनामात्र- मुच्यते, न दोषनिश्चयाय; स्वाभाविकनैमित्तिकविकारयोर्विवेकस्य १दुर्ज्ञेयत्वात् । अथ कश्चिन्निपुणमतिर्विवेकं प्रतिपद्येत, तथापि न पराजयनिमित्तं कार्यं भवति । नहि मरिष्यतो लिङ्गदर्शनेन मृतकार्यं कुर्वन्ति । एवमस्य पराजयो भविष्यतीति लिङ्गादवगतेऽपि न पराजयनिमित्तकार्यप्रसङ्गः ॥ १३-१५ ॥ भाषा—जो इधर-उधर घूमता रहता है ( एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता ) ओठों को जीभ से चाटता है, ललाट से पसीना निकलता है, जिसके मुख का रंग उतरा रहता है । जिसका मुँह बोलते समय सूखने लगता है, रुक-रुक कर वाणी निकलती है, अपने विरुद्ध बहुत सी बातें कहता है ( पूर्व काल में कही हुई बात के विरोध में कह ले जाता है ) पूछने पर तत्काल उत्तर नहीं देता; देखने पर सामने आँख उठा कर नहीं देखता, ओठों को टेढ़ा करता रहता है ( काटा करता है ) मन, वाणी, शरीर और कर्म के स्वभाव से परिवर्तित हो गया हो—इस प्रकार के व्यक्ति अभियोग और साक्ष्य में दुष्ट कहे गये हैं ॥ १३-१५ ॥ संदिग्धार्थे स्वतन्त्रो यः साधयेद्यश्च निष्पतेत् । न चाहूतो वदेत्किञ्चिद्धीनो दण्ड्यश्च स स्मृतः ॥ १६ ॥ किंच, संदिग्धमर्थमधमर्णेनानङ्गीकृतमेव यः स्वतन्त्रः साधननिरपेक्षः साधयत्यासेधादिना स हीनो दण्ड्यश्च भवति । यश्च स्वयं संप्रतिपन्नं साधनेन वा साधितं याच्यमानो निष्पतेत् पलायेत, यश्चाभियुक्तो राज्ञा चाहूतः सदसि न किंचिद्वदति 'सोऽपि हीनो दण्ड्यश्च स्मृतः' इति संब- ध्यते । 'अभियोगे च साक्ष्ये वा दुष्टः स परिकीर्तितः' इति प्रस्तुतत्वाद्धीनपरि- ज्ञानमात्रमेव मा भूदिति 'दण्ड्य'ग्रहणम् । दण्ड्यस्य चापि 'शास्योऽप्यर्थाच्च हीयत' इत्यार्थाद्धीनत्वदर्शनात्तन्मा भूदिति 'हीन' ग्रहणम् ॥ १६ ॥ भाषा—जो सन्दिग्ध धन अपनी इच्छा से ( बिना किसी प्रमाण के ) लेना चाहे और जो व्यक्ति स्वयं स्वीकार किये गये या प्रमाणित हुए धन के माँगने पर भाग जाय, जो अभियुक्त राजा द्वारा बुलाये जाने पर कुछ भी उत्तर न दे, वे सभी पराजित होते हैं और दण्ड के भागी कहे गये हैं ॥१६॥ अथ यत्र द्वावपि युगपद्धर्माधिकरणं प्राप्तौ भाषावादिनौ । तद्यथा—कश्चि- त्प्रतिग्रहेण क्षेत्रं लब्ध्वा कंचित्कालमुपभुज्य कार्यवशात्सकुटुम्बो देशान्तरं गतः । अन्योऽपि तदेव क्षेत्रं प्रतिग्रहेण लब्ध्वा कंचित्कालमुपभुज्य देशान्तरं १. दुर्ज्ञानत्वात् । १२ या०