याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्यायः ४७१ मिल जाते हैं। कुछ कर्मों का फल इस लोक में या देहान्तर में निश्चित रूप से प्राप्त होता है। कर्मों के शुभाशुभ फल के विषय में सत्त्वादि भाव ही प्रयोजन हैं ॥ १३३ ॥ मनोवाक्कायकर्मजैरन्त्यादियोनीः प्राप्नोतीत्युक्तं, तत्प्रपञ्चयितुमाह— परद्रव्येष्वभिध्यायंस्तथानिष्ठानि चिन्तयन् । वितथाभिनिवेशी च जायतेऽन्त्यासु योनिषु ॥ १३४ ॥ परधनानि कथमहमपहरेयमित्याभिमुख्येन ध्यायस्तथाऽनिष्ठानि ब्रह्महत्या- दीनि हिंसात्मकानि करिष्यामीति चिन्तयन् वितथे असत्यभूते वस्तुनि अभि- निवेशः पुनः पुनः संकल्पस्तद्वान् श्वचण्डालाद्यन्त्ययोनिषु जायते ॥ १३४ ॥ भाषा—दूसरे के धन के अपहरण का अवसर ढूंढ़ते रहने वाला, (ब्रह्म- हत्यादि) पापों का ही चिन्तन करने वाला, तथा असत्य वस्तुओं में पुनः पुनः संकल्प करने वाला कुत्ता, चण्डाल आदि अन्त्ययोनियों में जन्म लेता है ॥ १३४ ॥ पुरुषोऽनृतवादी च पिशुनः परुषस्तथा । अनिबद्धप्रलापी च मृगपक्षिषु जायते ॥ १३५ ॥ किंच, यस्त्वनृतवदनशीलः पुरुषः पिशुनः कर्णेजपः परुषः परोद्वेगकरभाषी अनिबद्धप्रलापी प्रकृतासङ्गतार्थवादी च बुद्धिपूर्वाबुद्धिपूर्वादितारतम्याद्धीनो- त्कृष्टेषु मृगपक्षिषु जायते ॥ १३५ ॥ भाषा—असत्यवादी, पिशुन (चुगलखोर), कठोर वचन कहने वाला और असङ्गत भाषण करने वाला मृग और पक्षी की योनि में जन्म लेता है ॥ अदत्तादाननिरतः परदारोपसेवकः । हिंसकश्चाविधानेन स्थावरेष्वभिजायते ॥ १३६ ॥ किंच, अदत्तादाननिरतः अदत्तपरधनापहारप्रसक्तः परदारप्रसक्तश्च अविहित- मार्गेण प्राणिनां घातकश्च दोषगुरुलघुभावतारतम्यात्तरुलताप्रतानादिस्थावरेषु जायते ॥ १३६ ॥ भाषा—बिना दिए हुए ही दूसरे की वस्तु का अपहरण करने में रत, परस्त्री में आसक्त और (अविहित विधि से यज्ञ-प्रयोजन के बिना ही) प्राणियों की हिंसा करने वाला स्थावर (वृक्ष, लता आदि) की योनियों में उत्पन्न होता है ॥ १३६ ॥ १. योनितां प्राप्नोतीति । २. पुरुषस्तथा । ३. पूर्वावृत्त्यादि । ४. स्थावरेषूपजायते ।