याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८६ $\qquad\qquad$ याज्ञवल्क्यस्मृतिः शरीर के विकार से युक्त होने तथा स्थूल आकार का होने से इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य बताया गया है ॥ १८१-१८३ ॥ $\quad$ स्वर्गमार्गमाह— $\qquad$ पितृयानोऽजवीथ्याश्च यदगस्त्यस्य चान्तरम् । $\qquad$ तेनाग्निहोत्रिणो यान्ति स्वगकामा दिवं प्रति ॥ १८४ ॥ $\quad$ अजवीथ्यमरमार्गः तस्यागस्त्यस्य च यदन्तरमसौ पितृयानस्तेनाग्निहोत्रिणः स्वर्गकामाः दिवं यान्ति स्वर्गं प्राप्नुवन्ति ॥ १८४ ॥ $\quad$ भाषा—अजवीथी ( देवताओं के मार्ग ) और अगस्त्य के बीच पितृयान ( पितरों का मार्ग ) है, इस मार्ग की इच्छा लेकर अग्निहोत्र करने वाले स्वर्ग में पहुँचते हैं ॥ १८४ ॥ $\qquad$ ये च दानपराः सम्यगष्टाभिश्च गुणैर्युताः । $\qquad$ तेऽपि तेनैव मार्गेण सत्यव्रतपरायणाः ॥ १८५ ॥ $\quad$ किंच, ये च दानादिस्मार्तकर्मपराः सम्यग्दम्भरहिताः तथाऽष्टाभिरात्मगुणैः 'दयाक्षान्तिरनसूयाशौचमनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहा' ( ८।२३ ) इति गौतमादिप्रतिपादितैर्युक्ताः । तथा ये च १सत्यवचननिरतास्तेऽपि तेनैव पितृ- यानेनैव सुरसदनमाप्नुवन्ति ॥ १८५ ॥ $\quad$ भाषा—जो दान ( स्मार्त कर्मों ) में तत्पर रहते हैं, सम्यक् ( अहं- काररहित होकर ) आत्मा के आठ गुणों से युक्त और सत्यवादी होते हैं वे उसी पितृयान से देवलोक को जाते हैं ॥ १८५ ॥ $\quad$ ननु नैमित्तिकादिप्रतिसंचरेऽखिलाध्यापकप्रलयादविदितवेदास्तस्योपरितना जनाः कथमग्निहोत्रादिकं कर्म करिष्यन्ति कथंतरां चाकृतकर्माणः स्वर्गमार्गम- धिरोक्ष्यन्तीत्यत आह— $\qquad$ २तत्राशीतिसहस्रमुनयो गृहमेधिनः । $\qquad$ ३पुनरावर्तिनो बीजभूता धर्मप्रवर्तकाः ॥ १८६ ॥ $\quad$ तत्र पितृयानेऽष्टाशीतिसहस्रसंख्या मुनयो गृहस्थाश्रमिणः पुनरावृत्तिध- र्माणः सर्गादौ वेदस्योपदेशकतया धर्मतरुप्रादुर्भावे बीजभूताः सन्तोऽग्निहोत्रा- दिधर्मप्रवर्तकाः, अतो न प्रागुदितदोष४समासङ्गः ॥ १८६ ॥ $\quad$ भाषा—उस पितृयान में अठासी हजार गृहस्थ मुनि निवास करते हैं ; जो ( सृष्टि के आरम्भ में ) पुनः पुनः वेद का उपदेश करने से धर्मरूपी वृक्ष की उत्पत्ति के निमित्त बीज के समान होते हैं ॥ १८६ ॥
$\quad$ १. सत्यवदन । $\quad$ २. अष्टाशीतिसहस्राणि । $\quad$ ३. पुनरावृत्तिनो. । ४. समागमः ।