याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्यायः ४८६ भाषा—वे आत्मज्ञानी क्रमशः अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, देव- लोक, सवितृ और तेज के लोक में जाते हैं। तब उन्हें मानस पुरुष ब्रह्मलोक में पहुँचाता है और उनका इस संसार में पुनः जन्म नहीं होता ( अर्थात् वे परमात्मा में विलीन हो जाते हैं ) ॥ १९३-१९४ ॥ पूर्वोक्तपितृयानमाह— यज्ञेन तपसा दानैर्ये हि स्वर्गजितो नराः। धूमं निशां कृष्णपक्षं दक्षिणायनमेव च ॥ १९५ ॥ पितृलोकं चन्द्रमसं वायुं वृष्टिं जलं महीम् । क्रमात्ते सम्भवन्तीह पुनरेव व्रजन्ति च ॥ १९६ ॥ एतद्यो न विजानाति मार्गद्वितयमात्मवान् । दन्दशूकः पतङ्गो वा भवेत्कीटोऽथवा कृमिः ॥ १९७ ॥ ये पुनर्विहितैर्मार्गैर्यज्ञदानतपोभिः स्वर्गफलभोक्तारस्ते क्रमाद्धूमादिचन्द्रपर्य- न्तपदार्थाभिमानिनीर्देवताः प्राप्य पुनरेव वायुवृष्टिजलभूमीः प्राप्य व्रीह्याद्यन्नरू- पेण शुक्रत्वमवाप्य संसारिणो योनिं व्रजन्ति । एतन्मार्गद्वयममत्तो यो न विजा- नाति मार्गद्वयमत्तो थो न विजानाति मार्गद्वयोपायभूतधर्मानुष्ठानं न करोति असौ दन्दशूको भुजङ्गः, पतङ्गः शलभः, कृमिः कीटो वा भवेत् ॥ १९५-१९७ ॥ भाषा—यज्ञ, तपस्या और दान से जो मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करते हैं वे धूम, निशा, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन, पितृलोक और चन्द्रलोक के देवताओं में जा पहुँचते हैं और फिर वायु, वृष्टि, जल और पृथिवी को प्राप्त कर ( व्रीहि- आदि अन्न से शुक्र बनकर ) क्रमशः इस संसार में पुनः जन्म लेते हैं ।, जो प्रमत्त व्यक्ति इन दोनों मार्गों को नहीं जानता है ( इन दोनों मार्गों के उपायभूत धर्म का अनुष्ठान नहीं करता है ) वह दन्दशूक साँप, पतंगा, कीड़ा अथवा कृमि का जन्म पाता है ॥ १९५-१९७ ॥ उपासनाप्रकारमाह— ऊरुस्थोत्तानचरणः सव्ये न्यस्योत्तरं करम् । उत्तानं किंचिदुन्नाम्य मुखं विष्टभ्य चोरसा ॥ १९८ ॥ निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो दन्तैर्दन्तानसंस्पृशन् । तालुस्थाचलजिह्वश्च संवृतास्यः सुनिश्चितः ॥ १९९ ॥ संनिरुद्धयेन्द्रियग्रामं नातिनीचोच्छ्रितासनः । द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्राणायाममुपक्रमेत् ॥ २०० ॥ १. न्यस्येतरं करम् ।