याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः भाषा—जो विद्वान् प्रत्येक पर्व में इसे द्विजो को सुनावे वह अवश्य ही अश्वमेध यज्ञ का फल पावे ऐसी अनुमति भी आप दें ॥ ३३३ ॥ वरदानमाह— श्रुत्वैतद्याज्ञवल्क्योऽपि प्रीतात्मा मुनिभाषितम् । एवमस्त्विति होवाच नमस्कृत्य स्वयंभुवे ॥ ३३४ ॥ एतहृषिभिर्भाषितं श्रुत्वा योगीन्द्रोऽपि स्वनिर्मितधर्मशास्त्रधारणादिफलप्रार्थ- नोन्मीलितमुखपङ्कजः स्वयंभुवे ब्रह्मणे नमस्कृत्य प्रणम्य 'भवत्प्रार्थितं सकलमित्थं भवतु'इत्येवं किल भगवान्बभाषे ॥ ३३४ ॥ भाषा—मुनियों के इन वचनों को सुनकर प्रसन्नचित्त योगिराज याज्ञ- वल्क्य ने स्वयंभू ब्रह्मा को नमस्कार करके कहा 'एवमस्तु' ( ऐसा ही हो ) ॥ इति श्रीभारद्वाजपद्मनाभभट्टोपाध्यायात्मजस्य श्रीमत्परमहंसपरिव्राजक- विज्ञानेश्वरभट्टारकस्य कृतौ ऋजुमिताक्षरायां याज्ञवल्क्यधर्मशास्त्र- विवृतौ प्रायश्चित्ताध्यायस्तृतीयः समाप्तः ॥