याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५० याज्ञवल्क्यस्मृतिः 'गुरु' चैवाप्युपासीत' में उपासन का अर्थ प्रणाम से अतिरिक्त उपासना के लिए है, क्योंकि प्रणाम वृद्ध-प्रणाम-पूर्वक ही मनु के द्वारा बतलाया गया है :— लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा । आददीत यतो ज्ञानं तत्पूर्वमभिवादयेत् ॥ श्लो० २९—दण्ड के विषय में मनु का वचन है :— ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ दण्ड का प्रमाण भी मनु ने ही बतलाया है :— केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः । ललाट-सम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ अजिन के विषय में बृहस्पति का वचन है :— कृष्णाजिनञ्चाह्मणस्य रौरवं क्षत्रियस्य तु । बस्ताजिनन्तु वैश्यस्य सर्वेषां वा गवाजिनम् ॥ बस्ताजिनम् = छाग-चर्म । यम के अनुसार "सर्वेषां रौरवाजिनम्" का सिद्धान्त है। परन्तु दोनों ही मत तत्तत् अजिन के अभाव में ग्राह्य हैं । उपवीत के विषय में मनु का मत निम्नलिखित है :— कार्पासमुपवीतं स्यात् विप्रस्योर्ध्व-वृतं त्रिवृत् । शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसूत्रजम् ॥ त्रिवृत् = तीन गुण करके । ऊर्ध्ववृतम् = दक्षिणावर्तित । यहाँ छन्दोग- परिशिष्ट में निम्नलिखित विशेष है :— ऊर्ध्वन्तु त्रिवृतं कार्यं तन्तुत्रयमथोवृतम् । त्रिवृतं चोपवीतं स्यात् तत्रैको ग्रन्थिरिष्यते ॥ अधोवृतम् = वामावर्तित । एवञ्च तीन सूत्रों को वामावर्तित करने के पश्चात् पुनः तीन बार दक्षिणावर्तित करने पर सङ्कलन में नौ सूत्र हो जाते हैं । उसके प्रत्येक त्रिक में एक ग्रन्थि होनी चाहिए । मेखलाम्—इस विषय में मनु का वचन निम्न-निर्दिष्ट है :— मौञ्जी त्रिवृत् समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला । क्षत्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शण-तान्तवी ॥ मूर्वा = एक प्रकार की लता । ज्या-पद के निर्देश से क्षत्रिय की मेखला में त्रिवृत्व का सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि वैसा होने पर ज्यात्व का ही