याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणी (नोट्स) ६५१ अपहार हो जायगा—ऐसा मेधातिथि तथा गोविन्दराज का मत है। अनुकल्प का भी निर्देश मनु ने किया है :— मुञ्जालाभे तु कर्त्तव्या कुशाऽश्मन्तक-बल्वजैः । त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ अश्मन्तक = कुश सदृश तृणविशेष । बल्वज = 'सावय'। मेखला आदि के नष्ट होने पर क्या करना चाहिए इसका नियम मनु ने ही बतलाया है :— मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् । अप्सु प्राश्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ ब्राह्मणेषु चरेद् भैक्षम्—यह मनूक्त का उपलक्षण है :— मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् । भिक्षेत भिक्षाप्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ पूर्व-पूर्व के अभाव में उत्तरोत्तर पक्ष ग्राह्य है। श्लो० ३१— सत्कृत्यान्नम्—अत एव आदित्य-पुराण में कहा गया है :— अन्नं दृष्ट्वा प्रणम्यादौ प्राञ्जलिः कथयेत्ततः ॥ अस्माकं नित्यमस्त्वेतदिति भक्त्या स्तुवन्नमेत् ॥ मनु ने भी कहा है :— पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति । अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ श्लो० ३६—मनु का मत कुछ भिन्न है :— षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्द्धम्पादिकं वाऽपि ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ प्रतिवेद बारह-बारह वर्ष, अथवा छः-छ वर्ष, अथवा, तीन-तीन वर्ष किंवा अध्ययन-समाप्ति-पर्यन्त ॥ श्लो० ३६—केशान्तश्चैव षोडशे—यहाँ वर्ष की गणना गर्भ-वर्ष से ही करनी चाहिए ऐसा बौधायन ने कहा है :— “स गर्भषोडशे वर्षे कर्त्तव्यः साग्निकेन, गर्भादिः संख्या वर्षाणाम्” श्लो० ३७-३८—उपनयन की चरमावधि के विषय में मनु का भी यही मत है— आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आद्वाविंशात् क्षत्र-बन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥