याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः यद्यपि पैठीनसि का मत है—"द्वादश षोडश विंशतिश्चेत्यतीताः विरुद्ध- काला भवन्ति” तथापि यह वचन इस तथ्य का प्रतिपादन करता है कि बारह- हवें वर्ष के बीत जाने पर अनुपनीत ब्राह्मण, सोलहवें वर्ष के समाप्त हो जाने पर अनुपनीत क्षत्रिय तथा बीसवें वर्ष के अतिक्रान्त हो जाने पर अनुपनीत वैश्य कुछ पाप का भागी हो जाता है—यह वीरमित्रोदयकार का मत है । याज्ञवल्क्य ने अन्तिम अवधि का निर्देश किया है, अतः उपर्युक्त पैठीनसि से कोई विरोध नहीं पड़ता है । व्रात्यों की निन्दा मनु के द्वारा निम्न-लिखित श्लोक में की गई है— नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् । ब्राह्मान् यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद् ब्राह्मणः सह ॥ यहाँ ब्राह्मणपद द्विजातिमात्र का उपलक्षक है । श्लो० ३९—मौञ्जी-बन्धन रूप द्वितीय जन्म के विषय में मनु का कथन है :— तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जी-बन्धनचिह्नितम् । तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥ मनु ने द्वितीय जन्म के अतिरिक्त तृतीय जन्म का भी निर्देश किया है—‘तृतीयं यज्ञ-दीक्षायाम्' । यहाँ यज्ञदीक्षा का अर्थ ज्योतिष्टोमादि-यज्ञ-दीक्षा है । इस तृतीय जन्म के विषय में कुल्लूकभट्ट की व्याख्या है—प्रथम- द्वितीय-तृतीयजन्मकथनञ्चेदं द्वितीयजन्म-स्तुत्यर्थम् , द्विजस्यैव यज्ञ-दीक्षाया- मधिकारात् । श्लो० ४४—अथर्वाङ्गिरसः—इसकी व्याख्या शूलपाणि ने निम्न- लिखित शब्दों में की है :—"अङ्गिरसा पृथक्कृतं सामवेदैकदेशम अभिचार- प्रधानकम्” । श्लो० ४५—नाराशंसी :—इसका अर्थ शूलपाणि ने “नारायणस्तुति- प्रकाशक ऋक्” किया है । “इदं जरा उपस्कृता” इत्यादि तीन ऋक् जो ऋग्वेद के खिल भाग में निर्दिष्ट हैं, नाराशंसी कहलाते हैं—ऐसा वीर- मित्रोदय का मत है । विद्या शब्द का अर्थ शूलपाणि के अनुसार, उपनिषद् है । श्लो० ४६—पत्न्याम् का अर्थ सवर्ण-पत्नी है, ऐसा शूलपाणि तथा वीरमित्रोदय-कार का कथन है । वैश्वानरेऽपि वा—अग्निशुश्रूषा का निरूपण बालम्भट्टी मे निम्नलिखित हारीत, शंख-लिखित तथा यम के वचन के अनुसार किया गया है :—