याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणी (नोट्स) ६५३ “यज्ञियाः समिध आहृत्य सम्मार्जनोपलेपनोल्लेखनसमूहनेन्धनपर्य्यग्नि- करणपरिक्रमणोपस्थानहोमस्तोत्रनमस्कारादिभिरग्निं परिचरेन्नाग्निमधितिष्ठेन्न पद्भ्यां कर्षेन्न मुखेनोपधमेत् नापश्च अग्निं च युगपत् धारयेत् नाजीर्णभुक्को नोच्छिष्टो वा अभ्यादध्याद्विविधैर्हविर्विशेषैर्यज्ञियैः अहरहरग्निमिन्धेदामन्त्र्य गच्छेत् आगत्य निवेदयेत् तन्मनाः शरीरोपरमान्ते ब्रह्मणः सायुज्यं गच्छति”। श्लो० ५०—इस कथन से यह सङ्केत किया जाता है कि चातुराश्रम्य का विधान नित्य नहीं है अपितु ऐच्छिक । तात्पर्य यह है कि चातुराश्रम्य में व्यतिक्रम की सम्भावना नहीं है अतिक्रम तो सर्वथा सम्भव है। श्लो० ५१—वर शब्द का अर्थ गुरु का अभिमत पदार्थ ही है। अत एव मनु का भी कथन है :— क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् । धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ यह उपलक्षण-मात्र है, यथासम्भव अन्यान्य पदार्थ का भी समर्पण करना चाहिए । यही बात लघुहारीत के वचन में भी कही गई है :— एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥ इससे स्पष्ट है कि केवल गुरु-प्रसन्नता ही गुरु-दक्षिणा है । यहाँ वेदा- ध्ययन का तात्पर्य अर्थज्ञान-पूर्वक वेदाध्ययन से है । अतएव कूर्म-पुराण में कहा गया है :— वेदं वेदौ तथा वेदान् वेदान् वा चतुरो द्विजः । अधीत्य चाधिगम्यार्थं ततः स्नायाद्यथाविधि ॥ अतएव प्रकृत याज्ञवल्क्य-श्लोक मे 'वेदम्' इस एकवचन को भी जाति- विवक्षा से ही उपयुक्त मानना चाहिए । व्रतानि—इस प्रसङ्ग में बालम्भट्टी का परिष्कार निम्नलिखित है :— “व्रतच्छेदपि आरण्यकमधीत्यैव तत् । वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा । व्रतच्छेऽपि शब्दार्थमारण्याध्ययने कृते ॥ इति कारिकोक्तेः । शब्दार्थमक्षरग्रहणार्थम न त्वर्थज्ञानाऽपेक्षाऽपि, अनुष्ठानानुपयोगात् । विरक्तस्योत्तरकालं साधनचतुष्टयसम्पन्नं प्रत्युत्तरमीमांसा- प्रवृत्तेः । प्रागुक्तकर्मन्तु कर्मकाण्डार्थज्ञानपरमिति भावः ।”