याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणी ( नोट्स ) ६८५ श्लो० १७१—यहाँ मनु ने विशेषता बतलाई है :— सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् । आगमः कारणं तत्र न संभोग इति स्थितिः ॥ श्लो० १७३—अर्वाक् संवत्सरात्—मनु के द्वारा “राजा ड्यब्दं निधा- पयेत् ।” जो कहा गया है वह सुवर्णादि स्थिर वस्तुओं के विषय में है, ऐसा शूलपाणि का मत है । श्लो० १७५—नान्वये सति सर्वस्वम्—एतच्च प्राग्दायविभागात् , विभक्तदायेषु तु पुत्रेषु सर्वस्वदानमनिषिद्धम्—( अपरार्कः ) श्लो० १७६—दत्त्वा नापहरेत्—अपहरण करने पर दोष का निर्देश हारीत ने किया है :— प्रतिश्रुताऽप्रदानेन दत्तसंश्लेहनेन च । विविधान्नरकान्याति तिर्यग्योनौ च जायते ॥ श्लो० १७७—परीक्षण के पहले दोष निकलने पर कृत्य का निर्देश बृहस्पति ने किया है :— अतोऽर्वाक् पण्यदोषस्तु यदि संजायते क्वचित् । विक्रेतुः प्रतिदेयं तत् क्रेता मूल्यमवाप्नुयात् ॥ मूल्य का तात्पर्य है कि विना सूद का ही मूलधनमात्र प्रत्यर्पणीय होता है । श्लो० १८३—आमरणान्तिकम्—अत एव नारद का कथन है :— राज्ञ एव तु दासः स्यात् प्रव्रज्याऽवसितो नरः । न तस्य प्रतिमोक्षोऽस्ति न विशुद्धिः कथञ्चन ॥ द्वावेव कर्मचाण्डालौ लोके दूरबहिष्कृतौ । प्रव्रज्योपनिवृत्तश्च वृथा प्रव्रजितश्च यः ॥ ‘वृथा प्रव्रजितः’ का अर्थ है प्रव्रज्या का अनधिकारी शूद्र यदि प्रव्रज्या का ग्रहण करे तो उससे भी आमरण दास्य करवाना चाहिए । परन्तु ब्राह्मण के प्रव्रज्याच्युत होने पर भी दास्य विहित नहीं है । ब्राह्मण के दण्ड का निरूपण दक्ष ने किया है :— पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति । श्वपादेनाङ्कितं तन्तु राजा शीघ्रं विवासयेत् ॥ कात्यायन-कथित प्रकार भी निम्नलिखित है :— प्रव्रज्याऽवसिता यत्र त्रयो वर्णा द्विजातयः । निर्वासं कारयेद्विप्रं दासत्वं क्षत्रविण्नृपः ॥