याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्याय श्लो० १—ऊनद्विवार्षिकम्—यह नियम चूडाकरणहीन शिशु के लिए है । यदि तु प्रथम वर्ष में ही चूडाकरण हो जाता है, अनन्तर शिशु की मृत्यु होती है तो वहाँ बिना मन्त्र से ही अग्नि संस्कार तथा उदक-दान करना ही चाहिए । अत एव लौगाक्षि का कथन है :— तूष्णीमेवोदकं कुर्यात् तूष्णीं संस्कारमेव च। सर्वेषां कृतचूडानामप्यन्नापीच्छया द्वयम् ॥ अधिक विवरण तो मिताक्षरा में ही दिया गया है । प्रेत-निर्हरण में दिशा का नियम आदिपुराण में बतलाया गया है :— पूर्वामुखस्तु नेतव्यो ब्राह्मणो बान्धवैर्गृहात् । उत्तराभिमुखो राजा वैश्यः पश्चान्मुखस्तथा । दक्षिणाऽभिमुखः शूद्रो निर्हर्त्तव्यः स्वबान्धवैः ॥ श्लो० २—यमसूक्तम्—‘परेयिवांसम्’ इत्यादि सूक्त (ऋग्वेद ७ । ६ । १४) । यम-गाथा—नाके सुपर्णम् इत्यादि मन्त्र (ऋग्वेद ७ । ३ । ११) । श्लो० ४—कामोदकम्—अत एव पारस्कर का भी कथन है:—“कामो- दकम् ऋत्विक् श्वशुर-सखि-मातुल-भागिनेयानाम्” । श्लो० ५—सकृत्प्रसिञ्चन्ति—यह उदक प्रेत को प्राप्त होता है । अत एव रामायण में कहा गया है :— इदं पुरुषशार्दूल विमलं दिव्यमक्षयम् । पितृलोकेषु पानीयं महत्तमुपतिष्ठताम् ॥ सकृत्—त्रित्व का भी विधान शास्त्र में है :— प्रेतं मनसा ध्यायन् दक्षिणाऽभिमुखः त्रीन् उदकाञ्जलीन् निनयेत्—(पैठी- नसि । अतः विकल्प मानना चाहिए । न ब्रह्मचारिणः—यह उपलक्षण है । अत एव बृहस्पति ने कहा है— नैष्ठिकानां वनस्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम् । नाऽऽशौचं सूतके प्रोक्तं शावे वाऽपि तथैव च ॥ श्लो० ८—मानुष्ये कदली०—यह उपलक्षण है । यथासमय उपदेश देकर संस्कर्ता को शान्त करना चाहिए । ४४ या०