याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) कि यदि स्मृति में कहीं वेद-विरुद्ध विषय हो तो उसे प्रमाण नहीं मानना चाहिए ( 'विरोधे त्वनपेक्षम् ०" जै० सू० १।३।३॥ ) तथापि विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि यदि वर्त्तमान वेद में अनुपलब्ध परन्तु अविरुद्ध स्मार्त्त-मत के मूल- भूत वैदिक-विधि का अनुमान हो सकता है तो क्या वर्त्तमान-वेद-विरुद्ध स्मार्त्तसिद्धान्तों से उनके मूल-भूत वेद का अनुमान नहीं किया जा सकता है ? वेदोक्तियों में आपन्न परस्पर विरोध तो विकल्प में ही पर्यवसन्न होता है न कि उससे वेद पर कुछ आक्षेप माना जाता है, जैसा मनु ने भी कहा है-- श्रुति-द्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ ( मनु० २।१४ ) स्मृति ( धर्म-शास्त्र ) का प्रतिपाद्य विषय धर्म-शास्त्र के प्रतिपाद्य-विषय का संकेत आङ्गिरस स्मृति में इस प्रकार किया गया है— “यत्पूर्वमृषिभिः प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् । तत्प्रमाणन्तु सर्वेषाँल्लोक-धर्मानुवर्णनम् ॥” (आङ्गिरस-स्मृति १।८) इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण, १ क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र एवम् वर्ण-सङ्कर के आजीवन कर्त्तव्य का अनुविधान ही धर्मशास्त्र का लक्ष्य है । इसी से यह भी स्पष्ट है कि 'धर्म-शास्त्र' शब्द में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द का अर्थ क्या है । विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में धर्म का विभाजन निम्न-लिखित रूप में किया है—"अत्र च धर्मशब्दः षड्विध-स्मार्त-धर्म-विषयः । तद्यथाः-वर्ण-धर्मः, आश्रम-धर्मः, वर्णाश्रम-धर्मः, गुण-धर्मः निमित्त-धर्मः, साधारण-धर्मश्चेति । ( मिताक्षरा—१।१ ) । ( १ ) वर्ण-धर्म का निर्देश भगवद्गीता में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया है । श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ब्राह्मण-वर्ण के धर्म ये हैं- शमो दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म-कर्म स्वभावजम् ॥ ( गीता-१८।४२) श्रीमद्भागवत ने ब्राह्मण-वर्ण के धर्म का परिगणन निम्नोक्त रूप में किया है— शमो दमः तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् । १. “भगवन्सर्व-वर्णानां यथावदनुपूर्वशः । अन्तर-प्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि ॥”—मनु० सं १।२ “वर्णाः ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राः ।......तेषाम् अन्तर-प्रभवाणां च सङ्कीर्ण-जातीनां चापि अनुलोभ-प्रतिलोमजानां च अम्बष्ठ-क्षत्तृ-कर्ण-प्रभृतीनां.........यथावत् यो धर्मो यस्य वर्णस्य येन प्रकारेणार्हतीत्यनेन आश्रम-धर्मादीनामपि प्रश्नः ।’ —मन्वर्थ-मुक्तावली १।२ “वर्णाश्रमेतराणां हि ब्रूहि धर्मानशेषतः” ! —या० स्मृ० १।२