भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

( ३ ) ज्ञानं दयाऽच्युतात्मत्वं सत्यञ्च ब्रह्म-लक्षणम्¹ ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२१) मनु का कथन निम्न-लिखित है— अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ (मनु० १।८८) क्षत्रिय-धर्म का गीतोक्त स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है— शौर्यं तेजो धृतिः दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वर-भावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४३) श्रीमद्भागवतोक्त क्षात्र-धर्म अधोलिखित हैं— शौर्यंॱवीर्यं धृतिस्तेजः त्यागश्चात्म-जयः क्षमा । ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यञ्च क्षत्र-लक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२२) मनूक्त क्षत्रिय-धर्म का स्वरूप इस प्रकार है— प्रजानां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च । विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियाणां समासतः ॥ (मनु० १।८९) वैश्य-धर्म का वर्णन गीता में इस प्रकार किया गया है— कृषि-गौरक्ष्य-वाणिज्यं वैश्य-कर्म स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४४ क ख) श्रीमद्भागवत में वैश्य-धर्म का विवरण निम्न-लिखित रूप में प्रस्तुत किया गया है— देव-गुर्वच्युते भक्तिस्त्रि-वर्ग-परिपोषणम् । आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्य-लक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत ७।११।२३) मनु-प्रतिपादित वैश्य-धर्म का स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है— पशूनां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ (मनु० १।९०) शूद्र-धर्म का वर्णन भी गीता में है— परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४४ ग घ) तथा— शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवाॱस्वामिन्यमायया । अमन्त्र-यज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गो-विप्र-रक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२४)


१. श्रीमद्भागवत के सभी श्लोक श्रद्धेय डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्य जी के 'The Philosophy of the श्रीमद्भागवत' से उद्धृत किए गये हैं, एतदर्थ मैं उनका ऋणी हूँ। २ प्र० या०