यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय होने वाली ध्वनियों से आप का मन यज्ञ की ओर आकर्षित हो. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप सोलह कलाओं वाले हैं. आप को इंद्र देव के लिए इस पात्र में लिया गया है. सोलह कलाओं वाले इंद्र देव के लिए आप को इस पात्र में ग्रहण किया गया है. ( ३३ ) युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३४) हे इंद्र! आप हरि नामक घोड़े हैं. आप शत्रुनाशी हैं. तेज गति वाले घोड़े आप को मनुष्यों के यज्ञ में लेने आते हैं. यजमान ऋषियों की श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. सोमरस को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव के लिए मूल स्थान है. वे सोलह कलाओं वाले हैं. हम सोलह कलाओं वाले इंद्र के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३४ ) इन्द्रमिद्धरी वहतोप्रतिधृष्टशवसम्. ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३५) हे इंद्र! आप शत्रुओं का नाश करने वाले और सोम पीने वाले हैं. तेज गति वाले दो घोड़े आप को यज्ञ स्थल तक ले जाते हैं. हे सोम! आप कलश में ग्रहण करने योग्य हैं. यह आप का आश्रय स्थल है. इसलिए हम सोलह कलाओं वाले इंद्र की प्रसन्नता हेतु आप को ग्रहण करते हैं. ( ३५ ) यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य ऽ आविवेश भुवनानि विश्वा. प्रजापतिः प्रजया स १४ रराणस्त्रीणि ज्योति १४ षि सचते स षोडशी.. (३६) इंद्र देव से परम श्रेष्ठ और कोई देव नहीं है. वे सभी लोकों में व्यापक हैं. प्रजापति प्रजा के साथ रमण करते हैं. वे सोलह कलाओं वाले हैं. तीनों ज्योतियों को अपने में धारे हुए हैं. ( ३६ ) इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा तौ ते भक्षं चक्रतुरग्र ऽ एतम्. तयोरहमनु भक्षं भक्षयामि वाग्देवी जुषाणा सोमस्य तृप्यतु सह प्राणेन स्वाहा.. (३७) इंद्र सम्राट् हैं. वरुण देव राजा हैं. वे दोनों देव पहले भोग लगाते हैं. उस के बाद हम उस सामग्री का सेवन करते हैं. वाग् देवी प्राण के साथ जुड़ कर सोमरस तृप्ति देने की कृपा करें. हम उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ३७ ) अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्. १०० - यजुर्वेद