यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः. पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः.. (४२) हे महिमाशालिनी! आप इस कलश को पूरी तरह सूंघिए. इस के सोम आदि आप में प्रवेश करें. आप पुनः उस ऊर्जा को लौटाइए. वह ऊर्जा हमें हजारों धाराओं के रूप में मिले. हमें दुधारी गाएं व धन मिलें. (४२) इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते ऽदिते सरस्वति महि विश्रुति. एता ते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्.. (४३) हे गोमाता! आप हवन में काम्य हैं. आप चंद्रमा और सूर्य की ज्योति की तरह हैं. आप सरस, पृथ्वी पर विख्यात व वध योग्य नहीं हैं. आप हमारे नाम से अच्छी वाणी से देवताओं को बुलाने के लिए बोलिए. (४३) वि न ऽइन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विमृध ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे.. (४४) हे इंद्र देव! आप हमारे शत्रुओं व नीचों को मारिए. जो हमें दासता और अंधकार देना चाहते हैं. आप उन्हें अंधकार में ले जाइए. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप यहां स्थित रहिए. यह आप का मूल स्थान है, आप यहां स्थित रहिए. (४४) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४५) हे वाचस्पति! आप विश्व के कर्मों के सर्जक हैं. आप मन जैसे हैं. आज हम जो अन्न हवन कर रहे हैं. उसे स्वीकारिए. आप सज्जनता भरे काम करते हैं. आप विश्व का भरणपोषण करते हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप को विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा इंद्र देव के लिए समर्पित किया जाता है. (४५) विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्. तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुरो विहव्यो यथासत्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४६) हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप दुःख दूर करने वाले हैं. आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, अपूर्व, उग्र व विशेष आदरणीय हैं. हम आप का विशेष १०२ – यजुर्वेद