यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय गाड़ी से लाए जाने वाले और आसन पर बैठे हुए सोम हेतु उन के नाम से आहुति दीजिए. अगिंध में स्थित सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. इंद्र देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए अथवा नाम से ले जाए जा रहे सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. (५६) विश्वे देवा ऽ अ १४ शुषु न्युप्तो विष्णुराप्रीतपा ऽ आप्याय्यमानो यमः सूयमानो विष्णुः सम्भ्रियमाणो वायुः पूयमानः शुक्रः पूतः शुक्रः क्षीरश्रीर्मन्थी सक्तुश्रीः.. (५७) विश्वे देव को उन के नाम से आहुति दीजिए. हमारे प्रति प्रेम रखने वाले और पालनहार विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से सींचे जा रहे यम को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से अभिषिक्त किए जा रहे विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र किए जा रहे वायु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र शुक्र के लिए नाम से आहुति दीजिए. दूध में गूंधे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. सत्तू मिला कर तैयार किए हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दे कर शोभा बढ़ाइए. (५७) विश्वे देवाश्चमसेषूनीतोसुर्होमायोद्यतो रुद्रो हूयमानो वातोभ्यावृत्तो नृचक्षाः प्रतिख्यातो भक्षो भक्ष्यमाणः पितरो नाराश १४ साः.. (५८) विश्वे देव के लिए चमस में रख कर आहुति दीजिए. मायावी असुर के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. रुद्र के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. घिर जाने पर वात देव के नाम से आहुति दीजिए. नृचक्ष के लिए उस के नाम से आहुति दीजिए. खाने से बचे हुए सोम हेतु उस के नाम से आहुति दीजिए. (५८) सन्नः सिन्धुरवभृथायोद्यतः समुद्रोभ्यवहियमाणः सलिलः प्रप्लुतो ययोरोजसा स्कभिता रजा १४ सि वीर्यैर्भीवीरतमा शविष्ठा. या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतो.. (५९) स्नान के लिए तैयार (उद्यत) सोम सिंधु है. उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. समुद्र (घड़े) में रखे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. जल में व्याप्त सोम को उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन दोनों देवों (वरुण-विष्णु) के ओज से ओजवान हैं, उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन के पराक्रम से पराक्रमी हैं. जिन की क्षमता से सामर्थ्यवान हैं, यज्ञ में प्रथम आहुति पाने वाले देवों के लिए यह आहुति अर्पित की जा रही है. (५९) देवान्दिवमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु मनुष्यानन्तरिक्षमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु पितॄन्पृथिवीमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु यं कं च लोकमगन्द्यज्ञस्ततो मे भद्रमभूत्.. (६०) जो यज्ञ स्वर्ग में देवों के पास जाता है, वह यज्ञ (फल) हमें प्राप्त कराइए. हमें इष्ट द्रव्य (धन) प्राप्त कराइए. अंतरिक्ष को मिलने वाला यज्ञ फल मनुष्यों यजुर्वेद - १०५