यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय को प्राप्त कराइए. पितरों और पृथ्वी वाला यज्ञ फल मनुष्यों को प्राप्त कराइए. इष्ट धन प्राप्त कराइए. जोजो यज्ञ फल जिसजिस लोक में गया है, उस से हमारा कल्याण हो. ( ६० ) चतुस्त्रि ᳵ शतन्तवो ये वितत्निरे य ऽ इमं यज्ञं ᳵ स्वधया ददन्ते. तेषां छिन्न ᳵ सम्वेतद्दधामि स्वाहा घर्मो अप्येतु देवान्.. ( ६१ ) चौंतीस देव जो इस यज्ञ का विस्तार करते हैं, जो यजमानों को पौष्टिक पदार्थ प्रदान करते हैं, उन देवताओं के लिए ये आहुतियां अर्पित हैं. यज्ञ जैसे कार्यों से हम जो धन धारण करते हैं, वह हम ऐसे ही शुभ कार्यों में खर्च करते हैं. यह आहुति देवों को तृप्त प्रसन्न करने की कृपा करे. ( ६१ ) यज्ञस्य दोहो विततः पुरुत्रा सो अष्टधा दिवमन्वाततान. स यज्ञ धुक्ष्व महि मे प्रजाया ᳵ रायस्पोषं विश्वमायुरशीय स्वाहा.. ( ६२ ) हम यज्ञ का दोहन व उस का विस्तार करें. वह सभी का दुःख दूर करें. यह यज्ञ आठ प्रकार से ( संपूर्ण ब्रह्मांड में ) विस्तार पाए. यह यज्ञ स्वर्गलोक तक विस्तृत हो. यह यज्ञ हमें श्रेष्ठ संतान प्रदान करे. यह यज्ञ हमें धन प्रदान करे. यह यज्ञ हमें पोषकता दे. यह यज्ञ हमें पूर्णायु प्रदान करे. इस यज्ञ हेतु यह आहुति अर्पित है. ( ६२ ) आ पवस्व हिरण्यवदश्ववत्सोम वीरवत्. वाजं गोमन्तमा भर स्वाहा.. ( ६३ ) हे सोम! आप आइए. आप इस यज्ञ को पवित्र करने की कृपा कीजिए. आप हमें सोना, घोड़े, गौ, धन आदि भरपूर वैभव दीजिए. आप के लिए हम यह आहुति अर्पित करते हैं. ( ६३ ) १०६ – यजुर्वेद