यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय ऋत १४ सत्यमृत १४ सत्यमग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरामः. ओषधयः प्रति मोदध्वमग्निमेत १४ शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः. व्यस्यन् विश्वा ऽ अनिरा ऽ अमीवा निषीदन्नो अप दुर्मतिं जहि.. (४७) अग्नि सत्यस्वरूप और अमर हैं. सत्यस्वरूप अग्नि को हम अंगिरा ऋषि के समान परिपुष्ट करते हैं. सभी ओषधियां आनंदवर्द्धक हो कर अग्नि देव को प्राप्त होने की कृपा करें. आप हम सभी के प्रति शिवममय ( कल्याणकारी ) होने की कृपा करें. आप हमारे सभी कष्ट हरिए. आप निरोगी बनाइए. आप विराजिए. आप की कृपा से दुर्बुद्धि हमें छोड़ कर चली जाए. ( ४७ ) ओषधयः प्रति गृभ्णीत पुष्पवतीः सुपिप्पलाः. अयं वो गर्भ ऽ ऋत्वियः प्रत्न १४ सधस्थमासदत्.. (४८) हे ओषधियो! आप पुष्पवती व सुफलवती हैं. ऋतु के अनुरूप अग्नि के गर्भ में उत्पन्न होती हैं. अग्नि प्राचीन समय से सधे व विराजे हुए हैं. ( ४८ ) वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवाः. सुशर्मणो बृहतः शर्मणि स्यामग्नेरह १४ सुहवस्य प्रणीतौ.. (४९) हे अग्नि! आप विशाल, बलवान व दीप्तिमान हैं. आप द्वेषियों, राक्षसों व रोगों का नाश कीजिए. हमें सुखदायी विशाल महायज्ञ में लगाने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से हम अच्छी हवि वाले हों. हमें आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त कराइए. ( ४९ ) आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऽ ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (५०) हे जल देवो! आप भुवन में सुख के स्रोत व ऊर्जाधारी हैं. आप महान् देखने योग्य कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करें. ( ५० ) यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (५१) हे जल देवो! आप कल्याणकारी हैं. रसीले व अपना कल्याणकारी रस हमें प्राप्त कराइए. आप जिस रस से ( रोगों का ) क्षय करते हैं, उस रस को हमें प्राप्त कराइए. आप जनोपयोगी रस हमें प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( ५१ ) तस्मा ऽ अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (५२) हे जल देवो! आप अत्यंत कल्याण करने वाले हैं. हे जल देवो! आप उस रस को सेवन से वैसे ही पुष्ट करिए जैसे माताएं संतान को दुग्ध रस से पुष्ट करती हैं. ( ५२ ) मित्रः स १४ सृज्य पृथिवीं भूमिं च ज्योतिषा सह. सुजातं जातवेदमसमक्षमाय त्वा स १४ सृजामि प्रजाभ्यः.. (५३) जैसे हमारे मित्र सूर्य अपनी ज्योति के साथ पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार यजुर्वेद - १३३