भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 421 में से

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पृष्ठ 134

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय हम प्रजा के कल्याण के लिए अग्नि को प्रकाशित करते हैं. आप सम्यक् रूप से उत्पन्न हैं. आप सर्वविद् हैं. हम यक्ष्मा ( रोग ) नाश के लिए आप को सिरजते हैं. ( ५३ ) रुद्राः स ँ४ सृज्य पृथिवीं बृहज्ज्योतिः समीधिरे. तेषां भानुरजस्र ऽ इच्छुक्रो देवेषु रोचते.. (५४) रुद्रगणों ने पृथ्वी को सिरजा और विशाल ज्योति से लोक को प्रदीप्त किया ( चमकाया ). सूर्य की अजस्र ( लगातार ) ज्योति देवताओं को चमकाती है. ( ५४ ) स ँ४ सृष्टां वसुभी रुद्रैर्धीरैः कर्मण्यां मृदम्. हस्ताभ्यां मृद्वीं कृत्वा सिनीवाली कृणोतु ताम्.. (५५) धैर्यशाली वसुओं और रुद्रगणों द्वारा कर्मपूर्वक मिट्टी सिरजी गई है ( तैयार की गई है ). सिनीवाली देवी हाथों से उस मिट्टी को पात्र बनाने लायक तैयार करें तथा पात्र बनाने की कृपा करें. ( ५५ ) सिनीवाली सुकपर्दा सुकुरीरा स्वौपशा. सा तुभ्यमदिते मह्योखां दधातु हस्तयोः.. (५६) सिनीवाली देवी सुंदर केशों, सुंदर अंगों व सुंदर आभूषणों वाली हैं. वे देवताओं की माता हैं. वे हम लोगों को लिए हाथों में उखा ( पुरोडाश पकाने का पात्र ) धारण करने की कृपा करें. ( ५६ ) उखां कृणोतु शक्त्या बाहुभ्यामदितिर्धिया. माता पुत्रं यथोपस्थे साग्निं बिभर्तु गर्भ ऽ आ. मखस्य शिरो ऽ सि.. (५७) देवमाता उखा पात्र को शक्ति व सुमतिपूर्वक बाहु से धारण करने की कृपा करें. माता जैसे पुत्र को गोद में बैठाती है, वैसे ही आप अपने गर्भ ( बीच ) में अग्नि को धारने की कृपा करें. आप यज्ञ के सिर ( मुख्य ) हैं. ( ५७ ) वसवस्त्वा कृण्वन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि पृथिव्यसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्यं ँ४ सजातान्यजमानाय रुद्रास्त्वा कृण्वन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवास्यन्तरिक्षमसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानायादित्यास्त्वा कृण्वन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि द्यौरसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय विश्वे त्वा देवा वैश्वानराः कृण्वन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि दिशोसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय.. (५८) हे उखा देव! वसुगण गायत्री छंद से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व पृथ्वी हैं. आप हमारी प्रजा, यजमान व हमारे सजातियों १३४ - यजुर्वेद