भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 421 में से

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पृष्ठ 135

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

के लिए धन धारिए. आप हमारी प्रजा का पोषण व उसे गोपति बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारी प्रजा को श्रेष्ठ बलशाली बनाने की कृपा कीजिए. रुद्रगण त्रिष्टुप् छंद से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व अंतरिक्ष के समान हैं. अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आदित्यगण जगती छंद की सामर्थ्य से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व स्वर्गलोक हैं. अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप विश्वे देवा अनुष्टुप् से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने की कृपा करें. आप ध्रुव व दिशा रूप हैं. याजकों के लिए संतान, धन, पराक्रम सजातीय बांधवों का यथोचित सौहार्द दीजिए. (५८) अदित्यै रास्नास्यदितिष्टे बिलं गृभ्णातु. कृत्वाय सा महीमुखां मृण्मयीं योनिमग्नये. पुत्रेभ्यः प्रायच्छददितिः श्रपयानिति.. (५९) आप उखा की मेखला में हैं. आप बीच के स्थान में ग्रहण किए जाएं. देवमाता पृथ्विी की मिट्टी से अग्नि की आधारभूत उखा बनाने की कृपा करें. मिट्टी से निर्मित इसे पकाने के लिए पुत्रों को देने की कृपा करें. (५९) वसवस्त्वा धूपयन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्रुद्रास्त्वा धूपयन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदादित्यास्त्वा धूपयन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्विश्वे त्वा देवा वैश्वानरा धूपयन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वदिन्द्रस्त्वा धूपयतु वरुणस्त्वा धूपयतु विष्णुस्त्वा धूपयतु.. (६०) हे उखा देव! वसुगण गायत्री छंद से आप को धूप प्रदान करें. वसुगण अंगिरा जैसे आप को धूप प्रदान करें. रुद्रगण त्रिष्टुप् छंद से आप को धूप प्रदान करें. आदित्यगण जगती छंद से आप को धूप प्रदान करें. वैश्वानर अनुष्टुप् छंद से आप को धूप प्रदान करें. इंद्र देव आप को धूप प्रदान करें. वरुण देव आप को धूप प्रदान करें. विष्णु आप को धूप प्रदान करें. (६०) अदितिष्ट्वा देवी विश्वदेव्यावती पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत् खनत्वट देवानां त्वा पत्नीर्देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वद्दधतूखे धिषणास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वदभीन्धतामुखे वरूत्रीष्ट्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वच्छपयन्तूखे ग्नास्त्वा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत्पचन्तूखे जनयस्त्वाच्छिन्नपत्रा देवीर्विश्वदेव्यावतीः पृथिव्याः सधस्थे अङ्गिरस्वत्पचन्तूखे.. (६१) हे मिट्टी देव! देवमाता सब की इष्ट व सभी दैवी गुणों की खान हैं. आप भूमि पर सधने की कृपा कीजिए. देवमाता अंगिरा की तरह आप को खोदने की कृपा करें. देवपत्नी सभी दिव्य गुणों के साथ आप को पृथ्विी पर स्थापित (साधने) यजुर्वेद - १३५