भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 421 में से

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पृष्ठ 143

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय अन्तरग्ने रुचा त्वमुखायाः सदने स्वे. तस्यास्त्व ꣳ हरसा तपञ्जातवेदः शिवो भव.. (१६) हे अग्नि! यह उखा आप का घर है, इस में चमकिए. आप अपने ताप से इसे तपाइए. आप सर्वज्ञ हैं. आप कल्याणकारी होइए. ( १६ ) शिवो भूत्वा मह्यमग्ने अथो सीद शिवस्त्वम्. शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (१७) हे अग्नि! आप मेरे प्रति भी कल्याणमय हो कर इस उखे के घर में विराजिए. यहां भी कल्याणकारी हो कर ही रहिए. आप सभी दिशाओं को कल्याणकारी बनाइए. अग्नि! यह उखा आप का मूल स्थान है. आप इस में स्थित होने की कृपा कीजिए. ( १७ ) दिवस्परि प्रथमं जज्ञे अग्निरस्मद् द्वितीयं परि जातवेदाः. तृतीयमप्सु नृमणा ऽ अजस्रमिन्धान ऽ एनं जरते स्वाधीः.. (१८) सर्वप्रथम स्वर्गलोक में अग्नि का जन्म हुआ! दोबारा हमारे पास मनुष्यलोक में उन का जन्म हुआ. मेघ के रूप में उन का जन्म हुआ! तीसरी बार निरंतर प्रवाहित होने वाले जलों में उन का जन्म हुआ. वे निरंतर प्रवहमान हैं. ( १८ ) विद्या ते अग्ने त्रेधा त्र्याणि विद्या ते धाम विभृता पुरुत्रा. विद्या ते नाम परमं गुहा यद्विद्या तमुत्सं यत ऽ आजगन्थ.. (१९) हे अग्नि! हम आप को तीन प्रकार से तीन रूपों में जानते हैं. आप रक्षक व सर्वत्र व्याप्त हैं. हम आप के परम गुप्त रूप को भी जानते हैं. हम आप के मूल उत्स ( स्रोत ) को भी जानते हैं, जहां आप इन रूपों में प्रकट हुए हैं. ( १९ ) समुद्रे त्वा नृमणा ऽ अप्स्वन्तर्नृचक्षा ऽ ईंधे दिवो अग्न ऽ ऊधन्. तृतीये त्वा रजसि तस्थिवा ꣳ समपामुपस्थे महिषा अवर्धन्.. (२०) हे अग्नि! प्रजापति देव सब के कल्याणकारक हैं. वे आप को ईंधनमय बनाते हैं. परमात्मा सर्वद्रष्टा हैं. वही आप को प्रज्वलित करते हैं. आप स्वर्गलोक के स्तन जैसे हैं. आप ही सब की बढ़ोत्तरी करते हैं. ( २० ) अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्. सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (२१) अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्वी को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को प्रकाशित व उन के मध्य चमकते हैं. ( २१ ) यजुर्वेद - १४३