यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध बारहवां अध्याय श्रीणामुदारो धरुणो रयीणां मनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः. वसुः सूनुः सहसो अप्सु राजा वि भात्यग्र ऽ उषसामिधानः.. (२२) अग्नि उदारता से धन देने वाले, धनधारी, मनुष्यों को स्वर्ग प्राप्त कराने वाले और सोम के पालक हैं. वे बल के पुत्र, जलों के राजा और प्रदीप्त होने वाले हैं. वे सब से आगे शोभित होने वाले हैं. ( २२ ) विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भ ऽ आ रोदसी अपृणाज्जायमानः. वीडुं चिदद्रिमभिनत् परायञ्जना यदग्निमयजन्त पञ्च.. (२३) अग्नि संसार की पताका और उस का गर्भ हैं. उत्पन्न हो कर वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को व्याप्त कर लेते हैं. इंद्र देव जैसे देवराज रूप में वे बड़े से बड़े पर्वत को भी भेद देते हैं. पांच व्यक्ति अग्नि की पूजा करते हैं. ( २३ ) उशिकपावको अरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो नि धायि. इयर्त्ति धूममरुषं भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन्.. (२४) अग्नि इच्छा करने योग्य, पवित्र, दुष्टों के प्रति प्रेमहीन और श्रेष्ठ बुद्धि वाले हैं. वे अमर व मनुष्यों के इच्छापूरक हैं. उन का धुआं ऊपर की ओर जाता है. वे चमकीले हैं. अग्नि अपनी शोभा स्वर्गलोक तक फैलाते हैं. ( २४ ) दृशानो रुक्म ऽ उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः. अग्निरमृतो अभवद्वयोभिर्यदेनं द्यौरजनयत्सुरेताः.. (२५) अग्नि दर्शनीय हैं व रुक्म जैसी आभावाले हैं. अग्नि अपनी आभा से पृथ्वी पर शोभित होते हैं. चमकते हैं. अमर हैं. श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं. वे पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों के बीच शोभायमान हैं. ( २५ ) यस्ते अद्य कृणवद्भद्रशोचेऽपूपं देव घृतवन्तमग्ने. प्र तं नय प्रतरं वस्यो अच्छाभि सुम्नं देवभक्तं यविष्ठ.. (२६) हे अग्नि! आप शोभादायक हैं. आज यजमान ने आप के लिए विधिविधान और पवित्रतापूर्वक भोग की सामग्री बनाई है. आप घी से युक्त उस सामग्री को ग्रहण करने और अपने यजमानों को स्वर्ग के सुख प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( २६ ) आ तं भज सौश्रवसेष्वग्न ऽ उक्थ ऽ उक्थ ऽ आ भज शस्यमाने. प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवात्युज्जातेन भिनददुज्जनित्वैः.. (२७) हे अग्नि! आप यजमान को श्रेष्ठ यशदायी कामों व शास्त्र के पठनपाठन में लगाने की कृपा कीजिए. सूर्य और अग्नि प्रिय हैं. इन की कृपा से हम उन्नतिशील पुत्र और पौत्र प्राप्त करते हैं. इन की कृपा से हम अतीव अभ्युदय को प्राप्त करते हैं. ( २७ ) १४४ - यजुर्वेद 632/9