भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 421 में से

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पृष्ठ 145

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय त्वामग्ने यजमाना ऽ अनु द्यून् विश्वा वसु दधिरे वार्याणि. त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमन्तमुशिजो विवव्रुः.. (२८) हे अग्नि! हम यजमान प्रतिदिन आप का अनुसरण करते हैं. यजमान आप की कृपा से सभी प्रकार के धन प्राप्त करते हैं. आप के साथ हम सभी प्रकार के धन की इच्छा करते हुए उशिजों की तरह गायों के बाड़े में चले जाएं. ( २८ ) अस्ताव्यग्निन॑रा ᳪ सुशेवो वैश्वानर ऽ ऋषिभिः सोमगोपाः. अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (२९) अग्नि यजमानों के द्वारा सेवन योग्य हैं. अग्नि विद्वानों के द्वारा स्तुति किए जाने योग्य हैं. अग्नि नायक और सोम पालक हैं. हम द्वेष रहित स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक का आह्वान करते हैं. हे देव! आप हमें सुवीर बनाइए और हमारे लिए धन धारिए. ( २९ ) समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (३०) हे अग्नि! आप समिधावान हैं. हम आप की परिक्रमा करते हैं. आप हमारे अतिथि हैं. हम घी से आप को जगाते हैं. आप इस में हवि होमने की कृपा कीजिए. ( ३० ) उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः. स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः... (३१) हे अग्नि! आप प्राणस्वरूप हैं. आप को अपनी बुद्धि से ऊपर की ओर धारण करने की कृपा करें. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. आप सुमुख और ज्योति रूप धन वाले हैं. ( ३१ ) प्रेदग्ने ज्योतिष्मान् याहि शिवेभिरर्चिभिष्ट्वम्. बृहद्भिर्भानुभिर्भासन्मा हि ᳪ सीस्तन्वा प्रजाः... (३२) हे अग्नि! आप ज्योतिष्मान हैं. आप इसी रूप में यहां से प्रस्थान करने की कृपा कीजिए. हम कल्याणकारी स्तुतियों से आप की अर्चना करते हैं. आप की ये बड़ी- बड़ी लपटें सूर्य की तरह चमकती हैं. आप अपनी इन लपटों से अपनी संतान के प्रति हिंसा मत कीजिए. ( ३२ ) अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्. सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः... (३३) अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्‍वी को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को यजुर्वेद - १४५

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