भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 421 में से

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पृष्ठ 164

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय किया. प्रजापति ज्योतिर्मयी पृथ्‍वी के पृष्ठ भाग पर विराजने की कृपा करें. वे आप को प्राण, अपान, व्यान, धान सारे विश्व को प्रभूत ज्योति प्रदान करने की कृपा करें. अग्नि आप के अधिपति हैं. आप देवताओं के साथ स्थिर होने की कृपा कीजिए. आप अंगिरा के समान ध्रुव हो कर विराजिए. ( २४ ) मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ् मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः. ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे. वासन्तिकावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवे सीदतम्.. ( २५ ) चैत और वैशाख महीने वसंत ऋतु से संबंधित हैं. दोनों ऋतुएं अग्नि को अंदर से जोड़े रखने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्‍वीलोक आपस में सहयोग करने की कृपा करें. ओषधियां हमारे लिए फलीभूत होने की कृपा करें. समान व्रत वाली अग्नि बड़ेबड़े कामों में सहायता करने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच जो ये अग्नियां हैं, वे समान मन वाली हों. अग्नियां वसंत ऋतु से आवृत्त हों. वे फलीभूत होने की कृपा करें. सभी देव इंद्र का आश्रय ग्रहण करें. अग्नि देवता के साथ अंगिरा की तरह ध्रुव हो कर विराजिए. ( २५ ) अषाढासि सहमाना सहस्वारातीः सहस्व पृतनायतः. सहस्रवीर्यासि सा मा जिन्व.. ( २६ ) आप अषाढ़ व सहनशील हैं. आप शत्रुओं को पराजित कीजिए. आप सहस्र वीर्य वाले हैं. आप हमें जिताने की कृपा कीजिए. ( २६ ) मधु वाता ऽ ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः. माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः.. ( २७ ) वायु मधुरता से बहने की कृपा करे. नदियां मधुरतापूर्वक रहें. सारी ओषधियां मधुरतामय होने की कृपा करें. ( २७ ) मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव १४ रजः. मधु द्यौरस्तु नः पिता.. ( २८ ) रात्रि मधुर हो. उषा मधुर हो. पृथ्‍वी मधुमती हो. रज मधुर हो. हमारे पिता स्वर्गलोक मधुमय होने की कृपा करें. ( २८ ) मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ २ अस्तु सूर्यः. माध्वीर्गावो भवन्तु नः.. ( २९ ) वनस्पतियां हमारे प्रति मधुमान हों. सूर्य हमारे प्रति मधुमान ( कृपालु ) हों. गाएं हमारे प्रति माध्वी ( मधुरतामय ) होने की कृपा करें. ( २९ ) अपां गम्भन्त्सीद मा त्वा सूर्योभिताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः. अच्छिन्नपत्राः प्रजा ऽ अनुवीक्षस्वानु त्वा दिव्या वृष्टिः सचताम्.. ( ३० ) १६४ - यजुर्वेद