यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध तेरहवां अध्याय (हे कूर्म!) आप जल के गर्भ में विराजिए. आप सूर्य के मंडल में विराजिए. सूर्य आप को न तपाए. वैश्वानर भी आप को संतप्त न करें. आप प्रजा का निरंतर निरीक्षण कीजिए. दिव्य दृष्टि सदैव आप को सचेत करती रहे. (३०) त्रीन्त्समुद्रान्त्समसृपत् स्वर्गानपां पतिर्वृषभ ऽ इष्टकानाम्. पुरीषं वसानः सुकृतस्य लोके तत्र गच्छ यत्र पूर्वे परेताः.. (३१) आप ने तीनों लोकों के समुद्र को व्याप्त किया है. आप स्वर्ग के मालिक हैं. आप शक्तिमान हैं. आप इष्टकों (विश्व निर्माण में प्रयुक्त इकाइयों) में शक्ति भरने वाले हैं. आप पशुओं को बसाते हुए उसी लोक में जाइए, जहां अच्छे काम करने वाले पहले ही पहुंच चुके हैं. (३१) मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२) महान् पृथ्वी और स्वर्गलोक हमारे इस यज्ञ को अपनेअपने अंशों से पूरने की कृपा करें. भरणपोषण करने वाली सामग्रियां हमारी पिपासा शांत करें. (३२) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३३) विष्णु इंद्र देव से जुड़े हुए हैं. वे इंद्र देव के सखा हैं. विष्णु सभी कर्मों को देखते हैं और व्रतों का निर्माण करते हैं. (३३) ध्रुवासि धरुणेतो जज्ञे प्रथममेभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदाः. स गायत्र्या त्रिष्टुभानुष्टुभा च देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (३४) हे उखा! आप ध्रुव व धारक हैं. सर्वज्ञ अग्नि यज्ञ में सर्वप्रथम आप के यहां उत्पन्न हुए. अग्नि, गायत्री, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् आदि छंदों से देवताओं के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. (३४) इषे राये रमस्व सहसे द्युम्न ऽ ऊर्जे अपत्याय. सम्राडसि स्वराडसि सारस्वतौ त्वोत्सौ प्रावताम्.. (३५) हे उखा! आप सम्राट्, स्वयं प्रकाशित, सरस्वतीमय व पालन पोषणकर्ता हैं. आप अन्न, यश, साहस और ऊर्जा में रमण करते हैं. आप हमारे पुत्र पौत्रों को भी उस में रमण कराइए. (३५) अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (३६) हे अग्नि! आप दिव्य गुणों वाले हैं. आप अपने घोड़े रथ में जोतिए. वे आप के रथ के अरों का वहन कर के शीघ्र आप को गंतव्य तक ले जाएं. (३६) युक्ष्वा हि देवहूतमाँ २ अश्वाँ २ अग्ने रथीरिव. नि होता पूर्व्यः सदः.. (३७) हे अग्नि! आप हमारे लिए देवताओं को आमंत्रित करने वाले हैं. आप अपने यजुर्वेद - १६५