भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 421 में से

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पृष्ठ 172

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय धन दीजिए. देवताओं के दोनों अध्वर्यु दोनों अश्विनीकुमार आप को यहां प्रतिष्ठित करते हैं. ( ४ ) आदित्यास्त्वा पृष्ठे सादयाम्यन्तरिक्षस्य धर्त्रीं विष्टम्भनीं दिशामधिपत्नीं भुवनानाम्. ऊर्मिर्द्रप्सो अपामसि विश्वकर्मा त ऽ ऋषिरश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (५) हम इस इष्टका को आदित्य देव की पीठ पर स्थापित करते हैं. इष्टका अंतरिक्ष को धारण करती है. आप सभी दिशाओं को स्थिरता प्रदान करती हैं. आप भुवनों की पत्नी और जल की तरंगों की तरह हैं. आप के द्रष्टा ऋषि विश्वकर्मा हैं. अश्विनीकुमार देवताओं के पुरोहित ( अध्वर्यु ) हैं. दोनों अश्विनीकुमार आप को इस स्थान पर प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. ( ५ ) शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः. ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे. ग्रैष्मावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवे सीदतम्.. (६) हे इष्टकाओ! आप चमकीली, पवित्र, ग्रीष्म ऋतु जैसी और अग्नि के भीतर जुड़ी हुई हैं. आप स्वर्गलोक तक विस्तार पाएं. आप पृथ्वीलोक तक कल्पित होने की कृपा करें. जल और ओषधियां फल वाली हों. व्रत सहित अग्नियां ज्येष्ठता ( बड़प्पन ) के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. जो अग्नियां हम समान मन वालों के भीतर हैं, वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को शोभित करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु को दोनों ओर से फलीभूत करती हुई इंद्र देव के समान देवताओं में शोभित हों. अपनी दिव्यता से अंगिरा की भांति स्थिरतापूर्वक विराजने की कृपा करें. ( ६ ) सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूरादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वेदेवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (७) हे इष्टकाओ! आप ऋतुओं के साथ प्रेममय हैं. आप जलों के साथ प्रेममय हैं. आप देवों के साथ प्रेममय हैं. आयु देने वाले देवों के साथ प्रेममय हैं. आप इंद्रादि देवों के साथ प्रेममय हैं. हम अग्नि की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं. वैश्वानर की प्रसन्नता के लिए अध्वर्यु अश्विनीकुमार आप को यहां प्रतिष्ठित करते हैं. ऋतुओं सहित वसुगणों के साथ आप को अग्नि की प्रसन्नता के लिए प्रतिष्ठित १७२ - यजुर्वेद