यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध चौदहवां अध्याय से स्तुति की. उन्होंने पंचभूतों को सिरजा. पंचभूतों के स्वामी उस के अधिपति हुए. उन्होंने सातों से स्तुति की. उन्होंने सप्त ऋषियों को सिरजा. जगत्धारक परमात्मा उस के अधिपति हुए. ( २८ ) नवभिरस्तुवत पितरोऽसृज्यन्तादितिरधिपत्न्यासीदेकादशभिरस्तुवत ऋतवो सृज्यन्तार्तवा अधिपतय ऽ आसँस्त्रयोदशभिरस्तुवत मासा ऽ असृज्यन्त संवत्सरोधिपतिरासीत् पञ्चदशभिरस्तुवत क्षत्रमसृज्यतेन्द्रोधिपतिरासीत् सप्तदशभिरस्तुवत ग्राम्याः पशवोऽसृज्यन्त बृहस्पतिरधिपतिरासीत्.. (२९) परमपिता परमेश्वर ने पितरों को सिरजा. देवताओं की माता अदिति उन की स्वामिनी हैं. देवताओं की माता अदिति की नौ प्राणों से स्तुति की जाती है. नौ प्राणों से ऋतुएं सिरजीं. ऋतुओं के गुण अपनेअपने विषय के अधिपति हैं. उन अधिपतियों की दस प्राणों से स्तुति की गई. परमपिता ने महीनों को सिरजा. वर्ष को उन का अधिपति बनाया. उन की पंद्रह प्राणों से स्तुति की गई. क्षत्रियों को सिरजने वाले की भी प्राणों से स्तुति की गई. इंद्र देव उन के अधिपति हुए. जिस ने गांवों को सिरजा, जिस ने पशुओं को सिरजा, उन की सत्रह प्राणों से स्तुति की गई. बृहस्पति देव को उन का अधिपति बनाया. ( २९ ) नवदशभिरस्तुवत शूद्रार्यावसृज्येतामहोरात्रे अधिपत्नी आस्तामेकवि १७ शत्यास्तुवतैकशफाः पशवोऽसृज्यन्त वरुणोधिपतिरासीत् त्रयोवि १७ शत्यास्तुवत क्षुद्राः पशवोऽसृज्यन्त पूषाधिपतिरासीत् पञ्चवि १७ शत्यास्तुवतारण्याः पशवोऽसृज्यन्त वायुरधिपतिरासीत् सप्तवि १७ शत्यास्तुवत द्यावापृथिवी व्यैतां वसवो रुद्रा ऽ आदित्या ऽ अनुव्य्यायँस्त ऽ एवाधिपतय ऽ आसन्.. (३०) दस और नौ अर्थात् उन्नीस आंतरिक और बाहरी अंगों की तरह ही शूद्रों और आर्यों को सिरजा. दिन और रात उन के स्वामी हुए. इक्कीस अंगों से प्रजापति की स्तुति की गई. अंगों से ही छोटेछोटे पशुओं को सिरजा. वरुण देव उन के स्वामी हुए. तेईस अंगों से उन की स्तुति की गई. उन अंगों से और छोटेछोटे जीवजंतु ( पशु ) सिरजे. पूषा देव उन के अधिपति हुए. पच्चीस अंगों से उन की स्तुति की गई. उन अंगों से जंगली पशुओं को सिरजा. वायु उन के स्वामी हुए. सत्ताईस अंगों से उन की स्तुति की गई. इन से ही स्वर्गलोक व्याप्त है. इन से ही पृथ्वीलोक व्याप्त हैं. उन में ही आठ वसु, ग्यारह रुद्र व बारह मास वास करते हैं. आदित्य देव उन के स्वामी हुए. ( ३० ) नववि १७ शत्यास्तुवत वनस्पतयोऽसृज्यन्त सोमोधिपतिरासीदेकत्रि १७ शतास्तुवत प्रजा ऽ असृज्यन्त यवाश्चायवाश्चाधिपतय ऽ आसँस्त्रयस्त्रि १७ शतास्तुवत भूतान्यशाम्यन् प्रजापतिः परमेष्ठ्यधिपतिरासील्लोकं ता ऽ इन्द्रम्.. (३१) उनतीस अंगों से परमपिता की स्तुति की गई. उन अंगों से वनस्पति को सिरजा. यजुर्वेद - १७९