यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध चौदहवां अध्याय का ध्यान करते हुए आप को यहां स्थापित करते हैं. हे इष्टके! आप सभी के प्रेरक सविता देव के भाग हैं. आप पर बृहस्पति देव का अधिकार है. आप ने चतुष्टोम स्तोम से सभी दिशाओं की रक्षा की है हम उस स्तोम का ध्यान करते हुए आप की स्थापना करते हैं. ( २५ ) यवानां भागोस्ययवानामाधिपत्यं प्रजा स्पृताश्चतुश्चत्वारि ँ श स्तोम ऽ ऋभूणां भागोसि विश्वेषां देवानामाधिपत्यं भूत ँ स्पृतं त्रयस्त्रि ँ श स्तोम:.. ( २६ ) हे इष्टके! आप शुक्लपक्ष की तिथियों के भाग हैं. आप पर कृष्णपक्ष की तिथियों का अधिकार है. आप ने चत्वारिंशत स्तोम से प्रजा की रक्षा की. अतः उस का ध्यान धारण करते हुए हम आप को यहां स्थापित करते हैं. हे इष्टके! आप ऋतुओं के भाग हैं. आप पर देवों का अधिकार है. त्रयस्त्रिंशत स्तोम से आप ने प्राणियों की रक्षा की. अतः हम उस का ध्यान करते हुए आप की यहां स्थापना करते हैं. ( २६ ) सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः. ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे. हैमन्तिकावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवे सीदतम्.. ( २७ ) मार्गशीर्ष और पौष हेमंत ऋतु के भाग हैं. सावन और भादों ये दोनों मास वर्षा ऋतु से संबंधित हैं. आप अग्नि के भीतर जुड़े हुए हैं. हमारे लिए स्वर्गलोक फलीभूत हों. हमारे लिए पृथ्वीलोक फलीभूत हों. हमारे लिए जल फलीभूत हों. हमारे लिए ओषधियां फलीभूत हों. हे इष्टकाओ! आप चमकीली, पवित्र, ग्रीष्म ऋतु जैसी और अग्नि के भीतर जुड़ी हुई हैं. आप स्वर्गलोक तक विस्तार पाएं. आप पृथ्वीलोक तक कल्पित होने की कृपा करें. ओषधियां फलीभूत हों. जल और अग्नियां फलीभूत हों. व्रतसहित अग्नियां ज्येष्ठता ( बड़प्पन ) के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. जो अग्नियां हम समान मन वालों के भीतर हैं, वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को शोभित करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु को दोनों ओर से फलीभूत करती हुई इंद्र देव के समान देवताओं में शोभित हों. अपनी दिव्यता से अंगिरा की भांति स्थिरतापूर्वक विराजने की कृपा करें. ( २७ ) एकयास्तुवत प्रजा अधीयन्त प्रजापतिरधिपतिरासीत् तिसृभिरस्तुवत ब्रह्मासृज्यत ब्रह्मणस्पतिरधिपतिरासीत् पञ्चभिरस्तुवत भूतान्यसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत्सप्तभिरस्तुवत सप्त ऋषयोऽसृज्यन्त धाताधिपतिरासीत्.. ( २८ ) प्रजापति ने वाणी से एक स्तुति की. उस से प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की. वे सब के अधिपति हुए. उन्होंने तीनों ( प्राण, अपान, व्यान ) से एक स्तुति की. उन्होंने ब्रह्मा को उपजाया. ब्रह्मणस्पति को उस का अधिपति बनाया. उन्होंने पांचों प्राणों १७८ - यजुर्वेद