यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सोलहवां अध्याय नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६४) हे रुद्र देव! जो स्वर्गलोक में रहते हैं, जो बरसात की तरह बाण बरसाते हैं, हम उन्हें पूर्व दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें पश्चिम दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें उत्तर दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें दक्षिण दिशा में नमस्कार करते हैं. उन रुद्रगण को नमस्कार हो. रुद्रगण द्वारा हमें सुख और रक्षा प्राप्त हो. जो हम से द्वेष भाव रखते हैं, जिन से हम द्वेषभाव रखते हैं. रुद्रगण अपनी दाढ़ में ऐसे लोगों को रख लें ( दबा लें ). ( ६४ ) नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये ऽ न्तरिक्षे येषां वात ऽ इषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६५) हे रुद्रगण! अंतरिक्ष में स्थित आप को नमन. आप के बाण हवा की तरह हैं. हम पूर्व दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम पश्चिम दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम दक्षिण दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. उन्हें नमस्कार. वे हमारी रक्षा करें और हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं, जिन से हम द्वेष करते हैं, रुद्रगण उन्हें अपनी दाढ़ में रख लें ( दबा लें ). ( ६५ ) नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६६) हे रुद्रगण! पृथ्वी पर स्थित आप को नमन. आप के बाण अन्न बरसाते हैं. हम पूर्व दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम पश्चिम दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम उत्तर दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम दक्षिण दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. आप हमारी रक्षा करें. आप हमें सुख दें. आप उन्हें दाढ़ में रख लें ( दबा लें ), जो हम से द्वेष रखते हैं जिन से हम द्वेष रखते हैं. ( ६६ ) २०६ – यजुर्वेद