यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय जो परम शक्ति इस पूरे विश्व का पालनपोषण और संहार करती है, हम उन से धन की इच्छा करते हुए पहले ही उन्हें भी अपने वश में रखते हैं और हम भी उन के वश में रहते हैं. ( १७ ) कि ँᳵ स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्. यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः.. ( १८ ) परमात्मा किस अधिष्ठान पर आरंभ में अधिष्ठित थे ? इन की उत्पत्ति की क्या कथा है ? वह उत्पादक द्रव्य कैसा था ? वह भूमि पर उत्पन्न हुआ. विश्वकर्मा सारे विश्व का द्रष्टा है. स्वर्गलोक तक व्याप्त है. ( १८ ) विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्. सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव ऽ एकः.. (१९) वह परम शक्ति संपूर्ण विश्व पर आंख रखने वाली है. वह परम शक्ति सब ओर मुंह वाली है. वह परम शक्ति सब ओर बाहु वाली है. वह परम शक्ति सब ओर सामर्थ्य वाली है. उस परम शक्ति ने अपने बाहुबल की क्षमता से स्वर्ग को बिना आधार के उत्पन्न किया. परमात्मा एक है. ( १९ ) कि ँᳵ स्विद्वनं क ऽ उ स वृक्ष ऽ आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः. मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्.. (२०) वह वन कौन सा है, वह वृक्ष कौन सा है, जिस से ईश्वर ने स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को रचा. आप मनीषियों के मन से पूछिए कि सभी भुवनों को धारते हुए वे स्वयं किस स्थान पर अधिष्ठित हैं. ( २० ) या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा. शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः.. (२१) जिस ने ये परमधाम रचे; जो उन्नत, निम्न और मध्य धाम का रचयिता है; उस सर्जक के प्रति हम अपना सखा भाव प्रकट करते हैं. हम आप के लिए हवि धारते हैं. हम आप के लिए स्वयं यज्ञ करते हैं और आप के तन की बढ़ोतरी करते हैं. ( २१ ) विश्वकर्मन् हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्. मुह्यन्त्वन्ये अभितः सपत्ना ऽ इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (२२) हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप स्वयं यज्ञ कीजिए. आप पृथ्वी के हित के लिए यज्ञ कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को मोहित कीजिए. आप यहां ज्ञानवान सूर्य स्वरूप हैं. ( २२ ) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.. (२३) २१० - यजुर्वेद