भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 421 में से

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पृष्ठ 215

पूर्वाध सत्रहवां अध्याय असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽ ओजसा स्पर्धमाना. तां गूह्त तमसापव्रतेन यथामी अन्यो अन्यं न जानन्.. (४७) मरुतों की सेना हमारे वेग के साथ स्पर्द्धा करने वाले शत्रुओं तक पहुंचे, ताकि भ्रम हो जाने के कारण एक दूसरे को जानने में ही असमर्थ हो जाएं तथा अपने ही लोगों का नाश कर दें. ( ४७ ) यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽ इव. तन्न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (४८) जहां बाण ऐसे गिरे जैसे बिना चोटी वाले बालक गिरते हैं, वहां इंद्र देव हमें सुख प्रदान करें. बृहस्पति देव हमें सुख प्रदान करें. अदिति देव हमें सुख प्रदान करें. स्वामी देव हमें सुख प्रदान करें. ( ४८ ) मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (४९) हम वीर अपने अंगों को कवच से ढकते हैं. वरुण देव इसे दृढ़ बनाए रखें. सोम राजा हैं. वह सब को अमृत से अमर बनाएं. वरुण देव वरीय हैं. वह हमें विजयी करें. देवगण उन्हें आनंदित करें. ( ४९ ) उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाहुत. रायस्पोषेण स ᳪ सृज प्रजया च बहुं कृधि.. (५०) हे अग्नि! हम यजमान आप के लिए घी से आहुति भेंट करते हैं. आप उस से तृप्त होइए. आप हमें धन से पुष्ट कीजिए. हमारे लिए सुख प्रदान कीजिए. आप हमें बहुत प्रजा ( पुत्रपौत्र ) से समृद्ध कीजिए. ( ५० ) इन्द्रेमं प्रतरां नय सजातानामसद्वशी. समेनं वर्चसा सृज देवानां भागदा ऽ असत्.. (५१) हे इंद्र देव! आप हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाइए. आप हमारे सजातियों को हमारे वश में कीजिए. आप हमें समान वर्चस्वी और देवताओं को उन का भाग देने में समर्थ बनाइए. ( ५१ ) यस्य कुर्मो गृहे हविस्तमग्ने वर्धया त्वम्. तस्मै देवा ऽ अधि ब्रुवन्नयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (५२) हे अग्नि! हम जिस के घर पर यज्ञ कर्म करते हैं, उन को हवि प्रदान करते हैं, आप उस की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. सभी देवता उस का वर्चस्व स्वीकारें. सभी ब्रह्मज्ञान के स्वामी हो जाएं. ( ५२ ) उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः. स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः.. (५३) यजुर्वेद - २१५

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