यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय हे अग्नि! सभी देवगण मन से आप का भरपूर विस्तार करने की कृपा करें. आप हमारा कल्याण करें. आप हमें वैभववान बनाइए. ( ५३ ) पञ्च दिशो दैवीर्यज्ञमवन्तु देवीरपामतिं दुर्मतिं बाधमाना:. रायस्पोषे यज्ञपतिमाभजन्ती रायस्पोषे अधि यज्ञो अस्थात्.. (५४) पांचों दिशाएं इस दैवीय यज्ञ की रक्षा करें व यजमान की मंदबुद्धि दूर करें. पांचों दिशाएं यजमान की दुर्मति दूर करें. यज्ञपति को धन से पोसें. यज्ञपति को यशस्वी धन से पोसें. यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा करें. ( ५४ ) समिद्धे अग्नावधि मामहान ऽ उक्थपत्र ऽ ईड्यो गृभीतः. तप्तं घर्मं परिगृह्यायजन्तोजां यद्यज्ञमयजन्त देवाः.. (५५) यजमान समिधा से अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. घी से भरी आहुति अग्नि को प्रदान करते हैं. महान उक्थों ( स्तोत्रों ) से यज्ञ को सिद्ध किया जाता है. ( ५५ ) दैव्याय धर्त्रे जोष्ट्रे देवश्रीः श्रीमनाः शतपयाः. परिगृह्य देवा यज्ञमायन् देवा देवेभ्यो अध्वर्यन्तो अस्थुः.. (५६) सैकड़ों लोग देवताओं की दिव्यता तथा शोभा पाने के लिए यज्ञ करते हैं. देवों को यज्ञ में बुला कर अध्वर्यु यज्ञ करते हैं. उन के धाम को प्राप्त होते हैं. ( ५६ ) वीत १४ हविः शमित १४ शमिता यजद्ध्ये तुरीयो यज्ञो यत्र हव्यमेति. ततो वाका ऽ आशिषो नो जुषन्ताम्.. (५७) यजमान शांत मन से शांत हवियों वाला यज्ञ करते हैं. यह यज्ञ तुरीय ( चौथा एवं उत्तम ) कहा जाता है. यज्ञ के वाणीमय आशीष तन हमारी इच्छा के अनुकूल फलीभूत होते हैं. ( ५७ ) सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुदयाँ २ अजस्रम्. तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः.. (५८) हरे केशों वाली और सम्मुख स्थित सविता देव की रश्मियां उन के उदय होने से पूर्व ही प्रकट हो जाती हैं. अजस्र ( लगातार ) ज्योति प्रवाहित होने लगती है. सूर्य का प्रसव ( उदय ) होते ही विद्वान् समस्त भुवनों को देखने में समर्थ हो जाते हैं. ( ५८ ) विमान ऽ एष दिवो मध्य ऽ आस्त ऽ आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम्. स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम्.. (५९) सूर्य जगत् को रचने में समर्थ हैं. यह सूर्य मध्यलोक, पृथ्वीलोक तथा अंतरिक्षलोक—तीनों लोकों को अपनी दीप्ति से पूरी तरह भर देते हैं ( प्रकाशित २१६ - यजुर्वेद