यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय कर देते हैं )। सारे विश्व को अपने आश्रय में रखते हैं. सभी जलों को धारते हैं. सर्वद्रष्टा हैं. पूर्व और पश्चात के सभी मनोभावों को जानते हैं. ( ५९ ) उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुराविवेश. मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा विचक्रमे रजसस्पत्यन्तौ.. (६०) सूर्य वर्षा द्वारा समुद्र को सींचते हैं. वे समुद्र को धारते हैं. उन का मूल स्थान पूर्व दिशा है. वे अंतरिक्ष में निरंतर भ्रमणशील व स्वर्गलोक के बीच निहित रहते हैं. वे रज की रक्षा करते हैं. वे अद्भुत रश्मियों वाले और सर्वत्र भ्रमणशील हैं. ( ६० ) इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः. रथीतम १४ रथीनां वाजाना १४ सत्पतिं पतिम्.. (६१) सभी प्रार्थनाएं इंद्र देव को बढ़ोतरी प्रदान करती हैं. आप समुद्र की तरह विस्तृत, उत्तम रथी, अन्न के स्वामी व पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ६१ ) देवहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्सुम्नहूर्यज्ञ ऽ आ च वक्षत्. यक्षदग्निर्देवो देवाँ २ आ च वक्षत्.. (६२) यह यज्ञ देवताओं का आह्वान करने वाला है. यह यज्ञ देवताओं के लिए अच्छे मन से हवि वहन करें, देवताओं को सभी सुख प्रदान करे और देवताओं को अधिष्ठित करे. ( ६२ ) वाजस्य मा प्रसव ऽ उद्ग्राभेणोदग्रभीत्. अधा सपत्नानिन्र्दो मे निग्राभेणाधराँ २ अकः.. (६३) हे इंद्र देव! आप हमारे लिए अन्न उत्पादक हैं. आप हमारा उच्च मार्ग प्रशस्त कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को नीचे मार्ग पर पहुंचाइए. उन्हें अधोगति प्रदान कीजिए. ( ६३ ) उद्ग्राभं च निग्राभं च ब्रह्म देवा ऽ अवीवृधन्. अधा सपत्नानिन्द्राग्नी मे विषूचीनानव्यस्यताम्.. (६४) हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप ब्रह्मज्ञान की बढ़ोतरी कीजिए. आप श्रेष्ठ कर्म करने वालों का उच्च मार्ग प्रशस्त कीजिए. आप हमारे शत्रुओं का सर्वनाश कीजिए. ( ६४ ) क्रमध्वमग्निना नाकमुख्य १४ हस्तेषु बिभ्रतः. दिवस्पृष्ठ १४ स्वर्गात्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (६५) यजमान अग्नि से श्रेष्ठ व स्वर्गिक सुख पाएं. हाथ में उखा शोभित हों. देवताओं के साथ दिव्यलोक में जाकर स्वर्गिक सुख अनुभव करें. ( ६५ ) यजुर्वेद - २१७