यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय प्राचीमनु प्रदिशं प्रेहि विद्वानग्नेरग्ने पुरो अग्निर्भवेह. विश्वा ऽ आशा दीद्यानो वि भाह्यूर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे.. (६६) हे अग्नि! आप पूर्व दिशा का अनुकरण कीजिए. आप अग्रगामी होइए. आप सब का नेतृत्व कीजिए. आप विद्वान् और सब की आस हैं. आप अपनी चमकीली लपटों से सभी दिशाओं को चमकाइए. आप दोपायों तथा चौपायों सभी के लिए बल धारिए. ( ६६ ) पृथिव्या ऽ अहमुदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद्दिवमारुहम्. दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्वर्ज्योतिरगामहम्.. (६७) हम पृथ्वि से उच्च अंतरिक्षलोक में चढ़ते हैं. हम उच्च अंतरिक्षलोक से स्वर्गलोक में चढ़ते हैं. स्वर्गलोक से सूर्यलोक की ज्योति को प्राप्त होते हैं. ( ६७ ) स्वर्यन्तो नापेक्षन्त ऽ आ द्या ᳪ रोहन्ति रोदसी. यज्ञं ये विश्वतोधार ᳪ सुविद्वा ᳪ सो वितेनिरे.. (६८) जो सुखदायी स्वर्ग के सुख भोगते हैं, वे सांसारिक भोगों की अपेक्षा नहीं करते. वे यज्ञ के धारक वे श्रेष्ठ विद्वान् हैं. वे अपना उज्ज्वल यश फैलाते हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक से ऊपर आरोहण करते हैं. ( ६८ ) अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयतां चक्षुर्देवानामुत मर्त्यानाम्. इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषोः स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (६९) हे अग्नि! आप प्रथम प्रार्थित हैं. आप मनुष्यों और देवताओं के चक्षु स्वरूप और सब के पथ प्रदर्शक हैं. यज्ञ के इच्छुकों के पापनाशक हैं. आप ऐसे यजमानों को अपनी ज्योति से प्रकाशित करते हैं. उन का कल्याण करते हैं. ( ६९ ) नक्तोषासा समनसा विरूपे धापयेते शिशुमेक ᳪ समीची. द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्विभाति देवा ऽ अग्निं धारयन् द्रविणोदाः.. (७०) हे अग्नि! आप रात्रिकाल तथा उषस काल में समान रूप से सुशोभित होते हैं. आप विभिन्न रूप धारते हैं. आप उपयुक्त शिशु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हैं. आप पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक के बीच में शोभते हैं. आप धनदाता व वैभवधारी हैं. ( ७० ) अग्ने सहस्राक्ष शतमूर्धञ्छतं ते प्राणाः सहस्रं व्यानाः. त्व ᳪ साहस्रस्य राय ऽ ईशिषे तस्मै ते विधेम वाजाय स्वाहा.. (७१) हे अग्नि! आप हजार आंखों, सौ मूर्धा, सौ प्राण वाले हैं. आप हजार प्राण वाले व हजार धन वाले हैं. आप हमारे स्वामी हैं. हम आप के लिए अन्नमय आहुति भेंट करते हैं. आप के लिए स्वाहा. ( ७१ ) २१८ - यजुर्वेद