यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय सुपर्णो ऽ सि गरुत्मान् पृष्ठे पृथिव्याः सीद. भासा ऽ न्तरिक्षमापृण ज्योतिषा दिवमुत्तभान तेजसा दिश ऽ उद्दृ ष्य ह.. (७२) हे अग्नि! आप सुंदर पंख वाले गरुड़ स्वरूप हैं. आप पृथ्वी तल पर अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप अंतरिक्ष को अपनी कांति से पूर्ण करते हैं. आप अपनी ज्योति से स्वर्गलोक को उत्कृष्टता प्रदान करें. आप अपने तेज से दिशाओं को सुदृढ़ता व उत्कृष्टता प्रदान करें. ( ७२ ) आजुह्वानः सुप्रतीकः पुरस्तादग्ने स्वं योनिमा सीद साधुया. अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (७३) हे अग्नि! हम बहुत नम्रतापूर्वक आप का आह्वान करते हैं. आप हमारे सम्मुख पधारने व मूल स्थान पर सज्जनता से विराजने की कृपा कीजिए. आप इस यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप सभी यजमानों के साथ इस यज्ञ में होने व विराजने की कृपा कीजिए. ( ७३ ) ता ष्य सवितुर्वरेण्यस्य चित्रामाहं वृणे सुमतिं विश्वजन्याम्. यामस्य कण्वो अदुहत्प्रपीना ष्य सहस्रधारां पयसा महीं गाम्.. (७४) सविता देव! आप वरेण्य व अद्भुत हैं. हम आप का वरण करते हैं. आप विश्व के जन्मदाता हैं. कण्व ऋषि ने सविता देव की किरणें धारण करने वाली हजारों धाराओं से गाय को दुहा. हम आप की सुमति को स्वीकार करते हैं. ( ७४ ) विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे. यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवी ष्य षि जुहुरे समिद्धे.. (७५) हे अग्नि! आप ने परम स्थान पर जन्म लिया है. हम आप के लिए स्तुतियों का विधान करते हैं. आप श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान हैं. आप जिस मूल स्थान से प्रकट होते हैं. उसे यज्ञ के अनुकूल बनाते हैं. हम समिधाओं से आप के लिए आहुतियां समर्पित करते हैं. ( ७५ ) प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नो ऽ जस्रया सूर्म्या यविष्ठ. त्वा ष्य शश्वन्त उपयन्ति वाजाः.. (७६) हे अग्नि! आप प्रदीप्त व हमारे सम्मुख दीप्तिमान होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ में अधिष्ठित व लगातार यज्ञ में अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. आप हमें लगातार अपना प्रकाश प्रदान कीजिए. हम आप को शाश्वत अन्नमय आहुति प्रदान करते हैं. ( ७६ ) अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र ष्य हृदिस्पृशम्. ऋध्यामात ऽ ओहैः.. (७७) हे अग्नि! हम हृदयस्पर्शी स्तोत्रों से आप के घोड़ों को कल्याणकारी यज्ञ के लिए संवर्धित करते हैं. ( ७७ ) यजुर्वेद - २१९