यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय चित्तिं जुहोमि मनसा घृतेन यथा देवा ऽ इहागमन्वीतिहोत्रा ऽ ऋतावृधः. पत्ये विश्वस्य भूमनो जुहोमि विश्वकर्मणे विश्वाहादाभ्यं ४५ हविः.. (७८) हम चित्त से यज्ञ करते हैं. हम मन से घी की आहुति भेंट करते हैं. देवगण इस यज्ञ में आने व सत्य की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. देवगण विश्वपति, विश्व के रचयिता, विश्वकर्मा व विश्व के संतापहर्ता हैं. हम उन के लिए हवि प्रदान करते हैं. ( ७८ ) सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि. सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा.. (७९) हे अग्नि! आप की सात समिधाएं, सात जिह्वाएं व आप के सात ऋषि हैं. आप के सात प्रिय धाम व सात होता हैं. वे आप का सात प्रकार से यजन करते हैं. आप के सात मूल उत्पत्ति स्थान हैं. हम घी से आप के प्रति आहुति अर्पित करते हैं. ( ७९ ) शुक्रज्योतिश्च चित्रज्योतिश्च सत्यज्योतिश्च ज्योतिष्माँश्च. शुक्रश्च ऋतपाश्चात्य ४५ हा:... (८०) आप चमकीले, अद्भुत ज्योति वाले हैं. आप सत्य रूप ज्योति वाले और ज्योतिष्मान हैं. चमकीले सत्य स्वरूप पश्चिम दिशा वाले मरुत् देव हेतु यह आहुति अर्पित है. ( ८० ) ईदृङ् चान्यादृङ् च सदृङ् च प्रतिसदृङ् च. मितश्च सम्मितश्च सभरा:... (८१) यज्ञ में अर्पित हवि को इस तरह देखने वाले, अन्य दृष्टि से देखने वाले, समान दृष्टि से देखने वाले व सम्मिलित दृष्टि से देखने वाले मरुद्गण हेतु यह आहुति अर्पित है. ( ८१ ) ऋतश्च सत्यश्च ध्रुवश्च धरुणश्च. धर्त्ता च विधर्त्ता च विधारय:... (८२) मरुद्गण सत्य, सत्यवान, ध्रुव, धारक, धर्ता व विधर्ता हैं. वे देव हमारे यज्ञ को विशेष रूप से धारने की कृपा करें. ( ८२ ) ऋतजिच्च सत्यजिच्च सेनजिच्च सुषेणश्च. अन्तिमित्रश्च दूरे अमित्रश्च गण:... (८३) शुद्धस्वरूप, सत्यरूप, शत्रु सेनाओं के विजेता, श्रेष्ठ सेनाओं वाले, मित्रों के समीप रहने वाले, शत्रुओं को दूर हटाने वाले तथा संघबद्ध रहने वाले ये मरुद्गण हमारे इस यज्ञ में पधारें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. ( ८३ ) ईदृक्षास ऽ एतादृक्षास ऽ ऊ षु णः सदृक्षासः प्रतिसदृक्षास ऽ एतन. मितासश्च सम्मितासो नो अद्य सभरसो मरुतो यज्ञे अस्मिन्.. (८४) हे मरुद्गण! आप विविध कोणों से देखने वाले, समान कोण से देखने वाले, २२० - यजुर्वेद