यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय प्रत्येक समान कोण से देखने वाले मिश्रित कोण से देखने वाले, समान प्रकार के मिश्रित कोण से देखने वाले तथा समान अलंकारों के धारक हैं. आप आज हमारे इस यज्ञ में पधारें. आप के निर्मित यह आहुति अर्पित है. (८४) स्वतवाँश्च प्रघासी च सान्तपनश्च गृहमेधी च. क्रीडी च शाकी चोज्जेषी.. (८५) आप स्वयं अर्जित तप बल पूर्ण पुरोडाश का सेवन करते हैं. आप शत्रुओं को संताप देने वाले, गृहस्थ धर्म के पालक, क्रीड़ाशाली, बलवान व विजयशील हैं. (८५) इन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्यथेन्द्रं दैवींर्विशो मरुतोन्वर्तमानो ऽभवन्. एवमिमं यजमानं दैवीश्च विशो मानुषीश्चानुवर्त्मानो भवन्तु.. (८६) मरुद्गण की सेना इंद्र देव का अनुकरण करती है. वह इंद्र देव की प्रजा जैसी है व इंद्र देव के पथ का अनुकरण करती है. वैसे ही सभी दैवीय गुण मनुष्यों का अनुकरण करें. वैसे ही सभी प्रजा मनुष्यों का अनुकरण करें. (८६) इम २४ स्तनमूर्जस्वन्तं धयापां प्रपीनमग्ने सरिरस्य मध्ये. उत्सं जुषस्व मधुमन्तमर्वन्त्समुद्रिय २४ सदनमा विशस्व.. (८७) हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी स्तन व घी से भरे स्रुक का प्रेम से पान करें. आप उस से तृप्त होने की कृपा करें. वह मधुर हैं. आप इस समुद्र सदन में प्रवेश करने की कृपा करें. (८७) घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम. अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्.. (८८) हम घी को अग्नि के मुख में समर्पित करना चाहते हैं. यह अग्नि का मूल स्थान है. अग्नि घृत पर अश्रित हैं. वह अग्नि का धाम हैं. हे अध्वर्यु! आप अग्नि के लिए हवि प्रदान कीजिए. उन्हें हवि से मदमस्त बनाइए. उन्हें हवि से बलवान बनाइए. अग्नि से अनुरोध है कि वह हवि को निर्धारित देव तक पहुंचाने की कृपा करें. (८८) समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ २ उदारदुपा २४ शुना सममृतत्वमानट्. घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः.. (८९) घी जैसा समुद्र है. उस में मधुर लहरें उमड़ रही हैं. ये लहरें अग्नि से एकमेक हो जाती हैं. घी का जो गुप्त नाम है, वह देवों की जिह्वा है. गुप्त नाम अमृत की नाभि है. (८९) वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन् यज्ञे धारयामा नमोभिः. उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुः शृङ्गो ऽ वमीद्गौर ऽ एतत्.. (९०) यजुर्वेद - २२१