यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय हम इस यज्ञ में घी के नाम को धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. हम यज्ञ में घी के नाम को नमस्कारपूर्वक धारण करते हैं. बारबार बोलते हैं. ब्रह्मा इस यज्ञ में इस नाम को पास से सुनने की कृपा करें. चार सींगों ( होता रूपी ) वाला घी इस यज्ञ के फल को प्रदान करने की कृपा करे. ( ९० ) चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य. त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ २ आविवेश.. (९१) इस यज्ञ के चार सींग ( पुरोहित रूपी ), तीन पैर ( तीन वेद रूपी ), दो सिर ( हवि प्रवर्ग्य ) व सात हाथ ( सात छंद रूपी ) हैं. यह यज्ञ तीन प्रकार की संध्याओं में बंधा हुआ, महान् शब्द करने वाला व मनुष्यों का महान् देव है. इस यज्ञ के मनुष्यलोक में अधिष्ठित हैं. ( ९१ ) त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन्. इन्द्र ऽ एक १४ सूर्य ऽ एकं जजान वेनादेक १४ स्वधया निष्टतक्षुः.. (९२) असुरों से छिपा कर रखे हुए घी को देवताओं ने तीन प्रकार से गायों से प्राप्त कर लिया. एक प्रकार से ( एक भाग ) इंद्र देव के लिए जना. दूसरे प्रकार से ( दूसरा भाग ) सूर्य के लिए जना. तीसरे प्रकार से ( तीसरा भाग ) ब्राह्मणों के लिए जना. ( ९२ ) एता ऽ अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे. घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य ऽ आसाम्.. (९३) जैसे हृदय रूपी समुद्र से भावों की धाराएं फूटती हैं, दुश्मन इन धाराओं को देख नहीं सकता, वैसे ही इस यज्ञ में घी की धाराएं फूटती हैं. इन धाराओं के बीच विद्यमान अग्नि को हम सब ओर से देखते हैं. ( ९३ ) सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः. एते अर्षन्त्युर्मयो घृतस्य मृगा ऽ इव क्षिपणोरीषमाणाः.. (९४) जैसे सम्यक् रूप से नदी बहती है, वैसे ही हमारे अंतःहृदय से पवित्र की जाती हुई वाणी स्रवित होती है. ये वाणियां घी की तरंगों की तरह हैं. यज्ञ की ओर शिकारी से डरे हुए हिरण की तरह भागती हैं. ( ९४ ) सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः. घृतस्य धारा ऽ अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः.. (९५) जैसे समुद्र में वायु के वेग से नदियों की धाराएं मिलती हैं, वैसे ही घी की धाराएं तीव्र वेग से यज्ञ की अग्नि में गिरती हैं. जैसे बलवान घोड़ा शत्रुओं की सेना को बेध देता है और पसीने से पृथ्वी को सींचता हुआ प्रस्थान करता है, वैसे ही घी की धाराएं पृथ्वी को सींचती हैं. ( ९५ ) २२२ - यजुर्वेद