भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 421 में से

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पृष्ठ 223

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम्. घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः.. (९६) जैसे समान मन वाली सुंदर स्त्रियां खुश होती हुई अपने पति के पास जाती हैं, वैसे ही घी की धाराएं प्रदीप्त करती हुई अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि को व्यापक बनाती हैं. घी की धाराएं सर्वज्ञ अग्नि को प्राप्त होती हैं. अग्नि निरंतर उन धाराओं की कामना करते हैं. ( ९६ ) कन्या ऽ इव वहतुमेतवा ऽ उ अञ्ज्यञ्जाना ऽ अभि चाकशीमि. यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा ऽ अभि तत्पवन्ते.. (९७) जैसे सुंदर कन्या रूप वहन करती हुई स्वयंवर में वर के पास पहुंचती है, वैसे ही जहां सोमरस निचोड़ा जाता है, यज्ञ किया जाता है, वहां घी की धाराएं जाती हैं. ( ९७ ) अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त. इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते.. (९८) हे देवताओ! यह यज्ञ घी से सिंचित है. श्रेष्ठ स्तुतियुक्त है. जिस यज्ञ में मधुर स्वाद वाली घी की कल्याणमयी धाराएं गिरती हैं, आप ऐसी घृतमयी मधुर आहुतियों को यज्ञ से देवलोक तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( ९८ ) धामं ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि. अपामनीके समिथे य ऽ आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऽ ऊर्मिम्.. (९९) हे अग्नि! सभी लोक आप के धाम हैं. आप सब लोकों के आश्रय हैं. समुद्र के हृदय में आप का श्रेष्ठ रूप उपस्थित है. हम आप के मधुर लहरदार रूप को पा सकें. ( ९९ ) यजुर्वेद - २२३