भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 421 में से

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पृष्ठ 225

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय यज्ञ हमें फलीभूत हो. ज्येष्ठता हमारे आधिपत्य में रहे. अनीति हमारे नियंत्रण में रहे. क्रोध हम से दूर रहे. दुष्टों का हम प्रतिकार कर सकें. हमारी परिपक्वता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी गरिमा में बढ़ोत्तरी हो. हमारी वरिष्ठता में बढ़ोत्तरी हो. हम सर्वत्र प्रथम (श्रेष्ठ) साबित हों. हमारी व्यापकता में बढ़ोत्तरी हो. हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. हमारे बड़प्पन में बढ़ोत्तरी हो. हमारे वंश में बढ़ोत्तरी हो. हमारी उत्कृष्टता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें (सर्वविध) फलीभूत हो. (४) सत्यं च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनं च मे विश्वं च मे महश्च मे क्रीडा च मे मोदश्च मे जातं च मे जनिष्यमाणं च मे सूक्तं च मे सुकृतं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (५) यज्ञ फलीभूत हो. सत्य की बढ़ोत्तरी हो. श्रद्धा की बढ़ोत्तरी हो. धन की बढ़ोत्तरी हो. विश्व में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. मनोविनोद की बढ़ोत्तरी हो. हर्ष स्तर की बढ़ोत्तरी हो. संतान की बढ़ोत्तरी हो. सूक्तों में स्तर की बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (५) ऋतं च मेमृतं च मेयक्ष्मं च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वं च मेनमित्रं च मेभयं च मे सुखं च मे शयनं च मे सूषाश्च मे सुदिनं च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (६) यज्ञ से हमारे ऋत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे अमृत को बढ़ोत्तरी मिले. यज्ञ से हमारे यक्ष्मा में कमी हो. यज्ञ से हमारे आरोग्य में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे जीने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारी आयु में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शत्रुओं का अभाव हो. यज्ञ से हमारे अभय में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुख में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे शयन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे संध्याकर्म में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से हमारे सुदिन में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हो. (६) यन्ता च मे धर्ता च मे क्षेमश्च मे धृतिश्च मे विश्वं च मे महश्च मे संविच्च मे ज्ञात्रं च मे सूश्च मे प्रसूश्च मे सीरं च मे लयश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (७) यज्ञ से हम धारक हो जाएं. धैर्य की क्षमता बढ़े. यज्ञ से हमें संसार की सारी महानता प्राप्त हो. यज्ञ से हमें संपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हो. यज्ञ से हमें ज्ञान प्राप्त हो. यज्ञ से उत्पादन की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से खेती के साधनों की क्षमता में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से कष्टों में कमी हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत हो. (७) शं च मे मयश्च मे प्रियं च मेनुकामश्च मे कामश्च मे सौमनसश्च मे भगश्च मे द्रविणं च मे भद्रं च मे श्रेयश्च मे वसीयश्च मे यशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (८) यज्ञ से सब सुखों में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब आनंद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब प्रकार के आमोदप्रमोद में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब अनुकूल कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौमनस्य कामनाओं में बढ़ोत्तरी हो. यज्ञ से सब सौभाग्य में बढ़ोत्तरी यजुर्वेद - २२५