भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 421 में से

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पृष्ठ 230

पूर्वार्ध अठारहवां अध्याय यज्ञ से चार वर्ष का बैल और गाय सहायक हो. यज्ञ से सेचन समर्थ बैल और वंध्या गाय सहायक हो, यज्ञ से तंदुरुस्त बैल गर्भ घातिनी गाय सहायक हो. गाड़ी खींचने वाले बैल और हाल ही में ब्याई गाय हमें प्राप्त हो. अभिप्राय यह है कि हमें सब प्रकार का पशु धन मिले. (२७) वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाहे मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन १७ शिनाय स्वाहा विन १७ शिन ऽ आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा. इयं ते राण्मित्राय यन्तासि यमन ऽ ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानां त्वाधिपत्याय.. (२८) यह आहुति अन्न रूप चैत्र मास के लिए समर्पित है. यह आहुति प्रसव रूप वैशाख, मास के लिए समर्पित है. यह आहुति जलक्रीड़ा आदि में आनंददायक ज्येष्ठ मास के लिए है. यह आहुति क्रतु रूप आषाढ़ मास के लिए है. यह आहुति चातुर्मास में यात्रा निषेधक वसु रूप श्रावण मास के लिए है. यह आहुति भाद्र मास के लिए है. यह आहुति मनमोहक आश्विन मास के लिए है. यह आहुति कार्तिक मास के लिए है. यह आहुति विष्णु रूप मार्गशीर्ष मास के लिए है. यह आहुति पौष मास के लिए है. यह आहुति माघ मास के लिए है. यह आहुति ऋतुराज रूप फाल्गुन मास के लिए है. हे प्रजापति! आप हमारे मित्र के समान हितैषी हैं. आप यज्ञ आदि के बनाने वाले हैं. ऊर्जा और प्रजा की बढ़ोतरी के लिए हम आप को प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं. (२८) आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता १७ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां वाग्यज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पतां ब्रह्मा यज्ञेन कल्पतां ज्योतिर्यज्ञेन कल्पता १७ स्वर्ग्यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्. स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च बृहच्च रथन्तरं च. स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम वेट् स्वाहा.. (२९) यज्ञ से हमारी उमर बढ़े. प्राणों में तेज और बल बढ़े. नेत्र और कान श्रेष्ठ हों. वाणी उत्कृष्ट हो. आत्मा आनंदमय हो. वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा संतोषी हों. यज्ञ से ज्योतिष्मान परम तत्त्व मिले, यज्ञ से स्वर्ग अर्थात् सुख मिले. यज्ञ और स्तुति के मंत्र हमें अभीष्ट फल दें. सभी देव हमें देवत्व प्रदान करें. अर्थात् सुख दें. हम भी प्रजापति परमात्मा के रूप में सुख भोगें. इसी लिए यह आहुति समर्पित है. (२९) वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म साविषत्.. (३०) पृथ्वी माता अन्न पैदा करती हैं. हम पृथ्वी माता की महिमा को वाणी से गागा कर व्यक्त करते हैं. उस में सारा विश्व और लोक समाए हुए हैं. सविता देव इस पृथ्वी पर हमारी स्थिति को दृढ़तर करने की कृपा करें. (३०) २३० - यजुर्वेद