यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय परम शक्ति की नासिका में भेड़ ने बल सींचा. ग्रहों से अमृतमय प्राणों को सांस की राह मिली. सरस्वती ने उपवाक से व्यान को प्रकट किया. पैर से बाहर के लोम उपजाए. ( ९० ) इन्द्रस्य रूपमृषभो बलाय कर्णाभ्या ँ श्रोत्रममृतं ग्रहाभ्याम्. यवा न बर्हिर्भुवि केसराणि कर्कन्धु जज्ञे मधु सारघं मुखात्.. (९१) ऋषभ ने इंद्रियों का रूप रचा. कानों में बल बढ़ाया. श्रवण शक्ति वाले कानों की रचना की. जौ तथा कुशा से भौंहों के बालों की उत्पत्ति की. बेर से मुंह में मीठी लार उपजाई. ( ९१ ) आत्मन्नुपस्थे न वृकस्य लोम मुखे श्मश्रूणि न व्याघ्रलोम. केशा न शीर्षन्यशसे श्रियै शिखा सि ँ हस्य लोम त्विषिरिन्द्रियाणि.. (९२) विराट् इंद्र देव के शरीर में उपस्थ भाग के तथा नीचे के भाग के लोम वृक् के लोम रूप हुए. विराट् इंद्र देव के शरीर के व्याघ्र के लोम दाढ़ीमूंछ हुए. सिर पर यश के लिए केश उपजे. शोभा के लिए चोटी बनाई. अन्य इंद्रियों की त्वचा पर बाल सिंह के लोम के रूप में हुए. ( ९२ ) अङ्गान्यात्मान् भिषजा तदश्विनात्मानमङ्गैः समधात् सरस्वती. इन्द्रस्य रूप ँ शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः.. (९३) इंद्र देव के अंगों को वैद्य अश्विनीकुमारों ने आत्मा से जोड़ा और सरस्वती ने आत्मा को अंगों से जोड़ा. उन्होंने इंद्र के रूप को सौ वर्ष की आयु तक अनश्वर बनाया. चंद्रमा के साथ ज्योति को अनश्वरता दी. ( ९३ ) सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां पत्नी सुकृतं बिभर्ति. अपा ँ रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र ँ श्रियै जनयन्नप्सु राजा.. (९४) सरस्वती देवी अश्विनीकुमारों से योनि के बीच में गर्भ धारती हैं. वे अश्विनी की पत्नी हैं. वे इंद्र देव को धारती हैं. जलों के रस के साथ वरुण देव साम से इंद्र देव को पुष्ट करते हैं. जलों में सरस्वती श्रीमान् राजा को जनती हैं. ( ९४ ) तेजः पशूना ँ हविरिन्द्रियावत् परिस्रुता पयसा सारघं मधु. अश्विभ्यां दुग्धं भिषजा सरस्वत्या सुतासुताभ्याममृतः सोम ऽ इन्दुः.. (९५) वैद्य अश्विनीकुमार और देवी सरस्वती ने पशुओं के तेज से इंद्र देव के लिए हवि निर्मित की. दूध और घी को मधुमक्खियों के मधु के साथ मिला कर मधुर पेय निर्मित किया. अमृत जैसा शक्तिवर्द्धक सोमरस तैयार किया. ( ९५ ) २५४ - यजुर्वेद