भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 421 में से

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पृष्ठ 257

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय ग्यारह से तिगुने यानी तैंतीस देव तीन समूह में ऐश्वर्य से युक्त बृहस्पति को पुरोहित बना कर देवताओं के अनुशासन में रहें. देवता अपनी दिव्य सामर्थ्य से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ११ ) प्रथमा द्वितीयैर्द्वितीयास्तृतीयाैस्तृतीयाः सत्येन सत्यं यज्ञेन यज्ञो यजुर्भिर्यजू ष्ँ षि सामभिः सामान्यृग्भिरृचः पुरोनुवाक्याभिः पुरोनुवाक्या याज्याभिर्याज्या वषट्कारैर्वषट्कारा ऽ आहुतिभिराहुतयो मे कामान्त्समर्धयन्तु भूः स्वाहा.. ( १२) प्रथम देवता दूसरे के साथ, दूसरे तीसरे देव के साथ युक्त होने की कृपा करें. सत्य को सत्य के साथ जोड़ें. यज्ञ को यज्ञ से जोड़ें. यजुर्वेद को सामवेद के साथ जोड़ें. सामवेद को ऋचाओं से जोड़ें. ऋचाएं पुरोनुवाक्या से युक्त हों. पुरोनुवाक्या यज्ञ मंत्रों से युक्त हों. आहुतियां हमारी कामनाएं सिद्ध करने की कृपा करें. ( १२ ) लोमानि प्रयतिर्मम त्वङ् म ऽ आनतिरागतिः. मा ष्ँ संम ऽ उपनतिर्वस्वस्थि मज्जा म ऽ आनतिः.. ( १३) हमारे हर अंग के रोम जागें. हमारी त्वचा नरम व लुभावनी हो. हमारा मांस लचीला हो. अस्थियां पूरे शरीर का आधार बनें. हमारी मज्जा शरीर को नरमाई देने वाली हो. ( १३ ) यद्देवा देवहेडनं देवासश्चकृमा वयम्. अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १४) हे देवो! आप दिव्यगुणों से ओतप्रोत हों. अग्नि हमें हमारे द्वारा किए गए सभी पापों से मुक्त करें. अग्नि ऐसे सभी कार्यों से हमें बचाने की कृपा करें. ( १४ ) यदि दिवा यदि नक्तमेना ष्ँ सि चकृमा वयम्. वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १५) हम ने यदि दिन में कोई पाप किया हो, हम ने यदि रात में कोई पाप किया हो तो वायु हमारे द्वारा किए गए सभी पापों से हमें मुक्त करें. वायु हमें ऐसे सभी पापों से बचाने की कृपा करें. ( १५ ) यदि जाग्रद्यदि स्वप्न ऽ एना ष्ँ सि चकृमा वयम्. सूर्यो मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ष्ँ हसः.. ( १६) जाग्रत अवस्था या सोती हुई अवस्था में जो कोई भी पाप हम ने किया हो तो सूर्य हमें उस पाप से बचाने की कृपा करें. ( १६ ) यद्ग्रामे यदरण्ये यत्सभायां यदिन्द्रिये. यच्छूद्रे यदर्ये यदेनश्चकृमा वयं यदेकस्याधि धर्मणि तस्यावयजनमसि.. ( १७) यजुर्वेद - २५७