भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 421 में से

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पृष्ठ 258

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय जो ग्राम में, जो जंगल में, जो सभाओं में, जो इंद्रियों में हम ने पाप किए हैं, जो पाप शूद्रों और वैश्यों के साथ किए हैं, अधिकार को धारण करने या उस का निर्वाह करने में जो पाप हम ने किए हैं, उन से हमें मुक्त करने की कृपा करें. (१७) यदापो अघ्न्या ऽ इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च. अवभृथ निचम्पुण नीचेरुरसि निचम्पुण:. अव देवैर्देवकृतमेनोयक्ष्य मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि.. (१८) जल में जो अनुचित हैं, उन के प्रति वरुण देव हमें शाप मुक्त करने की कृपा करें. हे वरुण! आप निरंतर गतिशील हैं. आप अपनी गति मंद करने की कृपा करें. देवताओं के प्रति देव कार्यों में जो पाप किए हैं, आप उन का प्रायश्चित्त कराइए. मनुष्यों के प्रति मानवीय व्यवहार में जो पाप किए हैं. उन से बचाइए. शत्रुओं से रक्षा कीजिए. (१८) समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुतापः. सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (१९) समुद्र के जलों में आप का हृदय स्थित है. आप अंतःकरण से वहीं विराजते हैं. वहां जल के मेल से आप में ओषधियों के गुण समाहित हो जाते हैं. जलमय वे ओषधियां हमारे प्रति मैत्रीपूर्ण हों. जो हम से द्वेष करते हैं तथा जिन से हम द्वेष करते हैं उन के दुर्मित्र होइए. (१९) द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव. पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः.. (२०) पवित्र किए हुए जल से हम वैसे ही पाप मुक्त हो जाएं, जैसे नहाते ही पसीने और मैल से मुक्त हो जाते हैं. जैसे छलनी से घी छानने पर मैल रहित हो जाता है, वैसे ही आप हमारे पाप छान लीजिए. (२०) उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (२१) हम अंधकार से ऊपर, स्वर्गलोक व उत्तर दिशा में देखें. हम दिव्यदेव सूर्य की ओर जाएं. हम उत्तम ज्योति प्राप्त करें. (२१) अपो अद्यान्वचारिष १४ रसेन समसृक्ष्महि. पयस्वानग्न ऽ आगमं तं मा स १४ सृज वर्चसा प्रजया च धनेन च.. (२२) हम ने आज जल में संचरण किया है. जल के संसर्ग से हम ने आज अपनेआप को प्रक्षालित किया (धोया) है. हे अग्नि देव! हम जल से पवित्र हो कर आप के पास आए हैं. आप हमारे लिए वर्चस्व, संतान और धन का सृजन कीजिए. (२२) २५८ - यजुर्वेद