यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 421 में से
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पूर्वार्ध बीसवां अध्याय एधोस्येधिषीमहि समिदसि तेजोसि तेजो मयि धेहि. समाववर्ति पृथिवी समुषाः समु सूर्यः. समु विश्वमिदं जगत्. वैश्वानरज्योतिर्भूयासं विभून् कामान् व्यश्नवै भूः स्वाहा.. (२३) हे अग्नि! यह समिधा आप की बढ़ोत्तरी करती है. आप हमारी बढ़ोत्तरी करते हैं. आप तेजोमय हैं. हमारे लिए तेज धारिए. पृथ्वी हमें उत्तम सुख दे. सूर्य सुख दें. सारे जगत् को सुख दें. हम वैश्वानर की ज्योति हो जाएं. हम उन की कृपा से विविध कामनाओं की पूर्ति करें. अग्नि के लिए स्वाहा. (२३) अभ्या दधामि समिधमग्ने व्रतपते त्वयि. व्रतं च श्रद्धां चोपैमीन्धे त्वा दीक्षितो अहम्.. (२४) हे अग्नि! हम आप के लिए समिधा धारते हैं. आप व्रत पति हैं. हम दीक्षित हैं. आप के प्रति व्रत और श्रद्धा समर्पित करते हैं. आप को प्रज्वलित करते हैं. (२४) यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह. तँल्लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना.. (२५) जहां ब्राह्मण और क्षत्रियजन साथसाथ विचरण करते हुए निर्वाह करते हैं. जहां देवगण अग्नि देव के साथ रहते हैं, हम उस पुण्य ज्ञानमय लोक को पाएं. (२५) यत्रेन्द्रश्च वायुश्च सम्यञ्चौ चरतः सह. तँल्लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र सेदिर्न विद्यते.. (२६) जहां इंद्र देव और वायु साथसाथ विचरण करते हैं, हम उस पवित्र और ज्ञानमय लोक को प्राप्त करें. (२६) अ ँ शुना ते अ ँ शुः पृच्यतां परुषा परुः. गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः.. (२७) ओषधियों का रस सोमरस के साथ मिले. आप के कठोर अंग सोम के अंगों के साथ मिलें. आप की गंध सोम के साथ मिले. झरता हुआ रस हमें आनंदित करे. (२७) सिञ्चन्ति परि षिञ्चन्त्युत्सिञ्चन्ति पुनन्ति च. सुरायै बभ्रवै मदे किन्त्वो वदति किन्वः.. (२८) ओषधि का रस इंद्र को प्रसन्न करता व पवित्र करता है. इस रस के लिए ‘और क्या और क्या’ बोला जाता है. (२८) धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्. इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः.. (२९) हे इंद्र देव! हम स्तुति के साथ आप को धान, धानमय वस्तुएं, दही, मालपूए यजुर्वेद - २५१