भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 421 में से

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पूर्वाध [L1_R] बीसवां अध्याय समिद्ध ऽ इन्द्र ऽ उषसामनीके पुरोरुचा पूर्वकृद्वावृधानः. त्रिभिर्देवैस्त्रि १४ शता वज्रबाहुर्जघान वृत्रं वि दुरो ववार.. (३६) इंद्र देव समिधावान हैं. सब से पहले उषा काल में पूर्व दिशा को प्रकाशित करते हैं. पहले किए की बढ़ोतरी करते हैं. तीन के तिगुने सैकड़ों देवों के साथ आगे बढ़ते हैं. इंद्र देव ने वृत्र को मारा और द्वार खोले. ( ३६ ) नराश १४ सः प्रति शूरो मिमानस्तनूनपात्प्रति यज्ञस्य धाम. गोभिर्वपावान् मधुना समजन् हिरण्यैश्चन्द्री यजति प्रचेताः.. (३७) आप सब से प्रशंसित, सुखवीर, शरीर के रक्षक व यज्ञ के धाम हैं. गायों का दूध पीने वाले व मीठे घी से पुष्ट हैं. सुनहरी कांति वाले का उत्तम चित्त वाले यजमान यज्ञ करते हैं. ( ३७ ) ईडितो देवैर्हरिवाँ २ अभिष्टिराजुह्वानो हविषा शर्धमानः. पुरन्दरो गोत्रभिद्वज्रबाहुरा यातु यज्ञमुप नो जुषाणः.. (३८) इंद्र देवों से उपासित, गतिवान, अभीष्ट, यज्ञ में पूजनीय, हवि हेतु आमंत्रित, शत्रुनगरी भेदक, गोनाशक के नाशक व वज्रबाहु है. इंद्र देव हमारे यज्ञ का सेवन करने की कृपा करें. ( ३८ ) जुषाणो बर्हिर्हरिवान् न ऽ इन्द्रः प्राचीन १४ सीदत् प्रदिशा पृथिव्याः. उरुप्रथाः प्रथमान १४ स्योनमादित्यैरक्तं वसुभिः सजोषः.. (३९) इंद्र देव तेजोमय, वैभववान, सब के अभीष्ट व प्राचीन हैं. आप पृथ्‍वी की दिशा में विराजिए. आप आदित्यों और वसुओं के साथ हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. विशाल कुश के आसन पर विराजिए. ( ३९ ) इन्द्रं दुरः कवष्यो धावमाना वृषाणं यन्तु जनयः सुपत्नीः. द्वारो देवीरभितो वि श्रयन्ता १४ सुवीरा वीरं प्रथमाना महोभिः.. (४०) जैसे विदुषी और श्रेष्ठ पत्नी पति के साथ शोभा पाती है, वैसे ही देवताओं से शोभित वीरों से युक्त विशाल द्वारों वाले प्रख्यात इंद्र देव विधिविधान से पूर्ण यज्ञ शाला में पधारने की कृपा करें. ( ४० ) उषासानक्ता बृहती बृहन्तं पयस्वती सुदुघे शूरमिन्द्रम्. तन्तुं ततं पेशसा संवयन्ती देवानां देवं यजतः सुरुक्मे.. (४१) उषा देवी विशाल दिन और रात को चमकाती हैं. वे महान् व रसीली हैं. देवों के देव इंद्र देव को भी दीप्तिमान बनाती हैं. ( ४१ ) दैव्या मिमाना मनुषः पुरुत्रा होताराविन्द्रं प्रथमा सुवाचा. मूर्धन् यज्ञस्य मधुना दधाना प्राचीनं ज्योतिर्हविषा वृधातः.. (४२) [L47_R] यजुर्वेद – २६१

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