यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध बीसवां अध्याय दिव्य कार्य करने वाले यजमान श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से यज्ञ के मूर्धन्य देव इंद्र देव की स्थापना करते हैं. होता पूर्व दिशा में स्थित हैं. वे हवि से अग्नि की बढ़ोतरी करते हैं. अग्नि ज्योतिमान हैं. ( ४२ ) तिस्रो देवीर्हविषा वर्धमाना ऽ इन्द्रं जुषाणा जनयो न पत्नी:. अच्छिन्नं तन्तुं पयसा सरस्वतीडा देवी भारती विश्वतूर्तिः.. ( ४३ ) तीनों देवियां हवि से बढ़ोतरी पाती हैं. वे पत्नी के समान इंद्र देव को पोसती हैं. वे हमारे तंतु को न तोड़ें. सरस्वती देवी, भारती देवी और इड़ा देवी दूध और हवि से हमारा यज्ञ पूर्ण करें. सारे विश्व को विघ्नों से बचाएं. ( ४३ ) त्वष्टा दधच्छूष्ममिन्द्राय वृष्णेपाकोचिष्टुर्यशसे पुरूणि. वृषा यजन्वूषणं भूरिरेता मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्.. (४४) त्वष्टा देव इंद्र देव का बल और परिपक्व धन को धारें. यश से पूजे जाएं. यज्ञ में वर्षा करें और शक्ति दें. देव समान मन वाले हों. यज्ञ के मूर्धन्य देवों को तृप्त करें. ( ४४ ) वनस्पतिरवसृष्टो न पाशैस्तमन्या समञ्जञ्छमिता न देव:. इन्द्रस्य हव्यैर्जठरं पृणानः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन.. (४५) इंद्र देव हवि से जठराग्नि को पूर्ण करें. यज्ञ को मीठे घी से स्वादिष्ट बनाएं. देवगण बंधनहीन हैं. अपनी सामर्थ्य से प्रकाशमान हैं. वनस्पति के देवता हैं. ( ४५ ) स्तोकानामिन्दुं प्रति शूर ऽ इन्द्रो वृषायमाणो वृषभस्तुराषाट्. घृतप्रुषा मनसा मोदमानाः स्वाहा देवा ऽ अमृता मादयन्ताम्.. (४६) इंद्र देव शत्रुओं के प्रति गर्जना करते हैं. वे शूरवीर, शक्तिशाली शत्रुओं के नाशक और घी की आहुति से मन से प्रसन्न होते हैं. इंद्र देव हेतु स्वाहा. इंद्र देव अमृत से सभी को आनंदित करें. ( ४६ ) आ यात्विन्द्रोवस ऽ उप न ऽ इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः. वावृधानस्तवर्षीयस्य पूर्वीर्र्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्.. (४७) इंद्र देव हमारी रक्षा के लिए हमारे पास आएं. वह यहां बैठें. उन की यहां स्तुति की जाए. उन के पराक्रम से बड़ेबड़े कार्यों की बढ़ोतरी हुई. वे हमारे बल को स्वर्गलोक जैसा विस्तृत व पुष्ट करें. ( ४७ ) आ न ऽ इन्द्रो दूरादा न ऽ आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः. ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्.. (४८) २६२ – यजुर्वेद