यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तेईसवां अध्याय इष्ट है. इसीलिए आप को ग्रहण किया गया है. यही आप का मूल स्थान है. चंद्रमा आप की महिमा है. रात्रि आप की महिमा है. संवत्सर आप की महिमा है. पृथ्वी आप की महिमा है. अग्नि आप की महिमा है. नक्षत्रों में जो महिमा है, वह आप की है. चंद्रमा में जो महिमा है, वह आप की है. आप की उस महिमा के लिए स्वाहा. प्रजापति के लिए स्वाहा. देवगणों के लिए स्वाहा. ( ४ ) युञ्जन्ति ब्रघ्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (५) सूर्य जैसे स्वर्गलोक को प्रकाशित करते हैं और जैसे अपने चारों ओर के ग्रह को जोड़ते हैं, वैसे ही यजमान यज्ञ के सारे साधनों को जोड़ते हैं. ( ५ ) युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (६) मनुष्य के वाहन में घोड़े जोतने की तरह हवि ले जाने हेतु देवरथ में कामना पूरक हरि नामक घोड़े को जोतिए तथा धृष्णु नामक घोड़े को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. ( ६ ) यद्वातो अपो अगनीगन्प्रियामिन्द्रस्य तन्वम्. एत ६४ स्तोतरनेन पथा पुनरश्वमावर्तयासि नः.. (७) जब यह अश्व, जो वायु के समान वेगवान है, इंद्र देव के प्रिय जल को प्राप्त होता है, तब यजमानों को चाहिए कि वे अपने लिए उसी मार्ग से उस अश्व को लौटा दें. ( ७ ) वसवस्त्वाञ्जन्तु गायत्रेण छन्दसा रुद्रास्त्वाञ्जन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसा दित्यास्त्वाञ्जन्तु जागतेन छन्दसा. भूर्भुवःस्वर्लाजी ३ च्छाची ३ न्यव्ये गव्य ऽ एतदन्नमत्त देवा ऽ एतदन्नमद्धि प्रजापते.. (८) हे यज्ञ रूपी अश्व! वसुगण गायत्री छंद से आप को आंजते हैं. हे यज्ञ रूपी अश्व! रुद्रगण त्रिष्टुभ् छंद से आप को आंजते हैं. हे यज्ञ रूपी अश्व! आदित्यगण जगती छंद से आप को आंजते हैं. भूलोक में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. अंतरिक्ष में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. स्वर्गलोक में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. प्रजापति में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. देवगण में स्थित देव से अनुरोध है कि वे इस हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. ( ८ ) कः स्विदेकाकी चरति क ऽ उ स्विज्जायते पुनः. कि ६४ स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत्.. (९) यजुर्वेद - २९३