भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 421 में से

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पृष्ठ 294

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय कृपया बताइए कि कौन अकेला विचरता है ? कौन बारबार उत्पन्न होता है ? शीत की ओषधि क्या है ? बीज बोने के लिए कौन सा क्षेत्र सब से बड़ा है ? ( ९ ) सूर्य ऽ एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः. अग्निर्हिमस्य भेषजं भूमिरावपनं महत्.. (१०) सूर्य अकेले विचरते हैं. चंद्रमा बारबार उत्पन्न होता है. अग्नि शीत की ओषधि है. भूमि बीज बोने का सब से विशाल क्षेत्र है. ( १० ) का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः कि १थ् स्विदासीद् बृहद्वयः. का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला.. (११) यजमान पूछते हैं कि सब से पहले किस का चिंतन करना चाहिए ? सब से बड़ा कौन है ? सब से बड़ा रक्षक एवं शोभाधारक कौन है ? सब के रूपों को निगल जाने वाला कौन है ? ( ११ ) द्यौरासीत्पूर्वचित्तिरश्व ऽ आसीद् बृहद्वयः. अविरासीत्पिलिप्पिला रात्रिरासीत्पिशङ्गिला.. (१२) स्वर्गलोक के बारे में सब से पहले चिंतन करना चाहिए. अश्व सब से विशाल है. पृथ्वी सब से बड़ी रक्षिका है. पृथ्वी सब से ज्यादा शोभा धारने वाली है. रात्रि अपने अंधेरे में सब को छिपा कर रखने वाली है. ( १२ ) वायुष्ट्वा पचतैरवत्वसितग्रीवश्छागैर्न्यग्रोधश्चमसैः शाल्मलिर्वृद्ध्या. एष स्य राथ्यो वृषा पद्भिश्चतुर्भिरिदगन्ब्रह्मा ऽ कृष्णश्च नोवतु नमोग्नये.. (१३) वायु हमें परिपक्वता प्रदान करे. वायु काली गरदन वाली अग्नि दे. वटवृक्ष चमस प्रदान करे. शाल्मली वृक्ष ( सेमल ) बढ़ोतरी प्रदान करे. यह शक्तिमान, सर्वव्यापक, आनंददायक है. अग्नि चारों चरणों में जीवों को पोसें व अग्नि आगमन की कृपा करें. बिना काले यानी सफेद अश्व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. अग्नि के लिए नमस्कार. ( १३ ) स १थ् शितो रश्मिना रथः स १थ् शितो रश्मिना हयः. स १थ् शितो अप्स्वप्सुजा ब्रह्मा सोमपुरोगवः.. (१४) रश्मियों से यज्ञ रूपी रथ की प्रशंसा होती है. किरण रूपी घोड़ों से यज्ञ रूपी रथ की प्रशंसा होती है. जल में उत्पन्न जल में शोभा पाते हैं. ब्रह्मा की प्रशंसा सोम को आगे करने के कारण होती है. ( १४ ) स्वयं वाजिंस्तन्वं कल्पयस्व स्वयं यजस्व स्वयं जुषस्व. महिमा तेन्येन न सन्नशे.. (१५) २९४ - यजुर्वेद