यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तेईसवां अध्याय हे यज्ञ ऊर्जा! आप स्वयं बलवान हैं. आप अपने शरीर को फलीभूत कीजिए. आप स्वयं यज्ञ से विस्तृत होइए. आप पदार्थों से जुड़िए. उन्हें प्राणवान बनाने की कृपा कीजिए. आप की महिमा कभी भी नष्ट न हो. ( १५ ) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ २ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु.. (१६) परम शक्ति न मरती है, न क्षीण होती है. वह देवताओं के मार्ग से जाती है. वह सुगम पथ से वहां पहुंचती है, जहां अच्छे कर्म करने वाले लोग रहते हैं. वहां सविता देव स्वयं इसे धारण करते हैं. ( १६ ) अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्नग्निः स ते लोको भविष्यति तं जेष्यसि पिबैता ऽ अपः. वायुः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्वायुः स ते लोको भविष्यति तं जेष्यसि पिबैता ऽ अपः. सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतँल्लोकमजयद्यस्मिन्सूर्यः स ते लोको भविष्यति तं जेष्यसि पिबैता ऽ अपः.. (१७) अग्नि रूपी पशु से देवताओं ने यजन ( यज्ञ ) किया. जिस में अग्नि है, वही इस लोक में जीतता है और जीतेगा. यजमान इस ज्ञान को अपनाएं. वायु रूपी पशु से देवताओं ने यज्ञ किया. जिस में वायु प्रबल है, वह जीतता है और जीतेगा. यजमान इस ज्ञान को अपनाएं. सूर्य रूपी पशु से देवताओं ने यज्ञ किया. जिस में सूर्य तत्त्व की प्रधानता होती है, वह जीतता है और जीतेगा. यजमान इस ज्ञान को अपनाएं. ( १७ ) प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा. अम्बे अम्बिकेम्बालिके न मा नयति कश्चन. ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्.. (१८) प्राण के लिए स्वाहा. अपान के लिए स्वाहा. प्राण के लिए स्वाहा. हे अंबे! हे अंबिके! आप हमें किसी अप्रिय स्थिति में न ले जाएं. हे अंबालिके! आप हमें किसी अप्रिय स्थिति में न ले जाएं. ठंडी अग्नि कांपील पेड़ की समिधाओं पर पड़ी है. ठंडी अग्नि श्रेष्ठ हवियों के साथ ठंडी पड़ी हुई है. ( १८ ) गणानां त्वा गणपति ᳵ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ᳵ हवामहे निधीनां त्वा निधिपति ᳵ हवामहे वसो मम. आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्.. (१९) आप गणों के स्वामी हैं. हम आप गणपति का आह्वान करते हैं. आप प्रियों के बीच प्रिय हैं. हम आप प्रियपति का आह्वान करते हैं. आप निधियों के बीच प्रिय हैं. यजुर्वेद - २९५